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Video: वक्त ने ली ऐसी करवट कि हर तबके के बर्तन बदल गए, खाकरे के पत्तल-दौनों की पारम्परिक कला का अस्तित्व आ गया खतरे में

Patrika news network Posted: 2017-05-20 12:44:49 IST Updated: 2017-05-20 13:07:44 IST
  • एक जमाना था जब शादी-ब्याह, धार्मिक अनुष्ठान, सामाजिक रीति-रिवाजों आदि के लिए खाने की व्यवस्था में पत्तल-दौने अहम हिस्सा हुआ करते थे। खाना पकाने में जहां लोहे, तांबा-पीतल के बर्तनों का उपयोग होता था।

राकेश शर्मा "राजदीप"/ उदयपुर

एक जमाना था जब शादी-ब्याह, धार्मिक अनुष्ठान, सामाजिक रीति-रिवाजों आदि के लिए खाने की व्यवस्था में पत्तल-दौने अहम हिस्सा हुआ करते थे। खाना पकाने में जहां लोहे, तांबा-पीतल के बर्तनों का उपयोग होता था। वहीं, उसके वितरण में बांस की बनी टोकरियां अथवा छाब काम ली जाती थीं। उस दौर में प्लास्टिक और एल्यूमिनियम का प्रयोग गरीब तबके और पिछड़े समुदायों में ही होता था।

आज स्थितियां बिल्कुल बदल गई है। दैनिक जीवन में प्लास्टिक और एल्यूमिनियम से बनी वस्तुएं सर्वाधिक उपयोग ली जाने लगी हैं। बांस की टोकरियां, लोहे-तांबा-पीतल के बर्तन आमजन की रसोई से फाइव स्टार होटल्स का स्टेटस बन गई और मशीन से बने प्लास्टिक और फॉइल के पत्तल-दौनों ने हस्तनिर्मित खाकरों के पत्तल-दौनों को चलन से बाहर कर दिया।


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कारण एक नहीं अनेक

इन सबके पीछे समय के बदलाव की कहानी के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे में हुए परिवर्तन की हकीकत थी है। जानकार बताते हैं कि पुराने शहर में जगदीश चौक क्षेत्र में वारियों की घाटी के सैकड़ों परिवार खाकरे के पत्तल-दौने बनाया करते थे। सुबह उठने से लेकर रात सोने तक परिवार का हर सदस्य किसी न किसी रूप से इस व्यावसायिक कला में अपना योगदान जरूर करता

था। लेकिन, वर्तमान में संकरी गली में बने कुछ मकानों की देहरी अथवा मंदिर के चबूतरों पर बैठकर गिनी-चुनी अधेड़ या वृद्ध महिलाएं ही यह काम करती देखी जा सकती हैं।


उनसे पूछे जाने पर वे कहती हैं कि अब पहले की तरह जरूरतें भी नहीं रहीं। आज बुफे के दौर में बिठाकर खाने-खिलाने की परम्पराएं खत्म होती जा रही है। फिर, रेडिमेड थाली-कटोरी और मशीन के बने आकर्षक पत्तल-दौने के चलन ने इसका बाजार बिगाड़ कर रख दिया। कहीं फॉरवर्ड लोगों की मानसिकता ने भी इसे अघोषित रूप से 'बैकवर्ड' करार दिया। इसी कारण आज सैकड़ों परिवारों के हजारों सदस्यों की रोजी-रोटी के संकट के साथ इस पारम्परिक कला का अस्तित्व खतरे में नजर आ रहा है। 

आसपास गांवों से आती सामग्री

हाथ से बने पत्तल-दौनों के लिए खाकरे के पत्ते और तिनके काया, कुण्डाल, पाई, ऊन्दरी और झाड़ौल क्षेत्र से आवश्यक सामग्री आती है। इनसे तैयार हुए पत्तल-दौने शहर के अलावा आसपास गांवों के लोग भी ले जाते हैं। 



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पर्यावरण व पशुधन के लिए थे उपयोगी

इस व्यवसाय से जुड़ी जसोदा कहती हैं कि खाकरे से बने पत्तल-दौने शुद्धता की दृष्टि से अलग महत्व रखने के अलावा पर्यावरण और पशुधन के लिए भी लाभकारी थे। इनमें भोजन करने के बाद जूठन सहित पशु खा लेते, साथ ही बेकार पड़े रहने पर खाद बन जाती। आज भी लोग पुराने सूखे पत्तल-दौने यज्ञ-हवन में काम लेते हैं।

अब केवल मंदिर सेवा में उपयोग

सगाई-सगपण-शादी के अलावा मौत-मरण, हवन-पूजन-प्रसादी जैसे कार्यक्रमों में इन दौने-पत्तलों की उपयोगिता आज स्थानीय मंदिरों और नाथद्वारा मंदिर के चढ़ावों तक सीमित होकर रह गई है। इसी कारण हाथ के इस हुनर से पलने वाले तकरीबन सभी परिवारों पर रोजी-रोटी का संकट भी खड़ा हो गया है। इतना ही नहीं, आधुनिकता की होड़ में पिछड़ गई इस कला से नई पीढ़ी भी विमुख हो जाने से इसके लुप्त होने का खतरा बढ़ गया है।

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