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उदयपुर के इस शख्स को ईश्वर ने बख्शा है हुनर, आप भी हो जाएंगे इनकी कलाकारी के मुरीद..देखें video

Patrika news network Posted: 2017-06-10 19:10:44 IST Updated: 2017-06-10 19:11:31 IST
  • पेपरमेशी कला से जुड़े कलाकार कैलाश खटीक की कहानी

राकेश शर्मा 'राजदीप'/ उदयपुर.

मिलिए, शहर के जमीन से जुड़े ऐसे कलाकार से जिसने बहुत साधारण किंतु प्रयोगात्मक और महत्वपूर्ण कला साधना के बूते न केवल अपने परिवार को पाला-पोसा वरन् सैकड़ों स्कूली छात्र-छात्राओं को भी पारंगत किया। 

अपनाया पैतृक व्यवसाय 

मनोविज्ञान में एमए उत्तीर्ण कैलाश खटीक वर्ष 1996 में अपने पिता उदयलाल के साथ मिट्टी-कुट्टी, पेपरमेशी के काम से जुड़ गए। वे बताते हैं कि उन दिनों देवी-देवताओं की मूर्तियां, फ्लावर पॉट्स,  खिलौने और पशु-पक्षियों की प्रतिकृतियां ही ज्यादा चलन में थे। कालान्तर में फोटो फ्रेम्स, आर्टिफिशियल फल-फूल, डेकोरेटिव आयटम्स तथा पेन स्टैंड जैसे उपयोगी सामान की डिमांड बढ़ गई। हालांकि, प्लास्टर ऑफ पेरिस और प्लास्टिक के बढ़ते प्रचार-प्रसार से अब इस कला और कुटीर उद्योग पर संकट पैदा हो गया है। इसी कारण तीसरी पीढ़ी इससे विमुख और उदासीन नजर आती है। ये अलग बात है कि पिताजी के निधन के बाद मेरी माता, पत्नी, बेटी और बेटा वक्त जरूरत मेरी इस काम में सहायता करते हैं। 


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ऐसे बनती हैं कृतियां 

पेपर मेशी से विविध आकार की कृतियां बनाने के लिए रद्दी कागज, चॉक मिट्टी, मुल्तानी मिट्टी, देसी गोंद और रूई की जरूरत होती है। कागज को बारीक काटकर पानी में भिगो देते हैं। इसमें जरूरत के अनुसार बाकी सामग्री मिलाकर पुट्टी बनाई जाती है जिसे हाथों से आकार देकर या सांचे में ढालकर आकृतियां गढ़ते हैं। सूख जाने पर रेगमाल, सेंड पेपर से फिनिशिंग देने के बाद जरूरत मुताबिक ऑइल या वाटर कलर से रंग-रोगन कर दिया जाता है। इन कृतियों को पकाना नहीं पड़ता है। इन्हें रंग-रूप देने के लिए मोटी सुई, लोहा काटने वाली पुरानी ब्लेड, बेलन, चाकू, रेगमाल जैसे बेहद साधारण औजार काम लिए जाते हैं। 

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