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मिसाल: किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं ये बेटियां, विस्थापित परिवारों की बस्ती में फैला रहीं ज्ञान का उजियारा

Patrika news network Posted: 2016-12-02 13:28:06 IST Updated: 2016-12-02 13:28:06 IST
  • बिलिया में विस्थापित परिवारों की बस्ती में छात्राएं कई उम्रदराज लोगों में शिक्षा की अलख जगा रही हैं। साक्षर भारत मिशन के तहत ये छात्राएं स्वयंसेवी शिक्षक बनी हैं।

मोहित शर्मा/उदयपुर

बिलिया में विस्थापित परिवारों की बस्ती में छात्राएं कई उम्रदराज लोगों में शिक्षा की अलख जगा रही हैं। साक्षर भारत मिशन के तहत ये छात्राएं स्वयंसेवी शिक्षक बनी हैं। बस्ती में साक्षर भारत मिशन के तहत दो प्रेरक भी हैं। प्रेरकों के अलावा बस्ती के ही पढ़े-लिखे करीब 10 स्वयंसेवी शिक्षक भी असाक्षरता का कलंक मिटाने में जुटी हैं, जिनमें दो छात्राएं हैं। इन्हें सरकार से कोई मानदेय नहीं मिलता है। ये स्वयंसेवी स्वयं पढ़ाई कर रही हैं और दूसरों को भी पढ़ा रही हैं।

बस्ती में रहने वाली मीरा, माया व अन्य महिलाआें ने बताया कि ये स्वयंसेवी शिक्षक उनके लिए फरिश्ते की तरह हैं। इन्हें सरकार से कोई सहायता नहीं मिलती, फिर भी ये लोगों को पढ़ा रही हैं। रोज करीब 2 घंटे तक ये क्लास लेती हैं। केन्द्र पर बिजली सहित कई सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। एक महिला में तो पढऩे की ललक एेसी है कि उसके दायां हाथ नहीं है तो स्वयंसेवी कुसुम ने उसे बाएं हाथ से लिखना सिखा दिया। महिलाएं अभी हिंदी लिखना-पढऩा और गणित में जोड़-बाकी सीख रही हैं।


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कराती हैं होमवर्क

महिलाएं जब पढऩे के लिए केन्द्र पर जाती हैं तो उनके साथ बच्चों को भी ले जाती हैं। बच्चों को भी ये स्वयंसेवी बालिकाएं पढ़ाती हैं। केन्द्र पर पुरुष तो कभी-कभार ही आते हैं। पुरुषों में पढ़ाई को लेकर रुझान नहीं हैं।

पढ़ाना एक शौक

स्वयंसेवी कुसुम कुमारी ने बताया कि उन्हें पढ़ाने का शौक है। वह संस्कृत में एमए है और पिताजी कारीगर हैं। इस काम के लिए उन्हें कोई मानदेय भी नहीं मिलता। स्वयंसेवी शिक्षक नेहा सिसोदिया ने बीबीएम कर रखा है और आगे की पढ़ाई करने के साथ बस्ती के लोगों को पढ़ा रही हैं। नेहा के पिताजी ऑटो चालक हैं। उसके इस काम से उन्हें बहुत अच्छा लगता है।

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