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आदिवासी अंचल से निकल कोसों दूर पहुंची 'मेवाड़ की मिठास', आदिवासियों को मिला रोजगार

Patrika news network Posted: 2017-07-13 18:41:56 IST Updated: 2017-07-13 18:41:56 IST
आदिवासी अंचल से निकल कोसों दूर पहुंची 'मेवाड़ की मिठास',  आदिवासियों को मिला रोजगार
  • मेवाड़ के शहद की डिमांड इस शहर तक ही नहीं, बल्कि अन्य शहरों में भी होने लगी है।

उदयपुर.

आदिवासी संस्कृति से सजे सुदूर जंगलों वाला मेवाड़ यहां की वनोपज के लिए भी जाना जाने लगा है। उदयपुर जिले के कोटड़ा, झाड़ोल, प्रतापगढ़ के धरियावद आदि इलाकों से शहद इकट्ठा किया जा रहा है। मेवाड़ के शहद की डिमांड इस शहर तक ही नहीं, बल्कि अन्य शहरों में भी होने लगी है। प्रकृति से होती उपज आदिवासी अंचल के लिए रोजगार का जरिया बनती रही है। बदलते दौर में जहां जंगल खत्म होते जा रहे हैं, वहीं वनोपज से आदिवासियों में रोजगार करने की परंपरा भी दम तोड़ रही है। इसी बदलाव में जान फूंकने का काम हुआ एक अभियान के माध्यम से। आदिवासियों के हितों की बात करने वाली संस्था समर्थक समिति इसका जरिया बनी। आज शहर में स्वयंसेवी संस्था के सहयोग से आदिवासी अंचल में विधिवत रूप से रोजगार होने लगे हैं।



इसमें सबसे अहम कार्य है सुदूर जंगलों से शहद इकट्ठा करना। इस काम में जुटे परिवारों को पहले की तुलना में उचित दाम मिलने लगा है। वे शहद की ओर पलायन करने के बजाय सुदूर जंगलों से शहद इकट्ठा करने में रुचि लेने लगे हैं। प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध होने से आदिवासी संस्कृति की शहद जुटाने की परंपरा को एक मंच मिला है। स्थिति ये है कि चंद लोगों से हुई शुरुआत अब करीब 2000 आदिवासी लोगों तक पहुंच गई है, जो वनोपज से रोजगार करने लगे हैं।



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क्यों खास है यहां की मिठास

समर्थक समिति के संचालक कमलेंद्र सिंह ने बताया कि यूं तो शहद देशभर के जंगलों में पैदा होता है, लेकिन मेवाड़ के शहद में कुछ खास बात है। वजह है यहां की औषधीय वनस्पति। मधुमक्खियां यहां की औषधीय वनस्पति का रस चूसकर शहद बनाती है, जो अन्य प्रदेशों से उत्पन्न होने वाले शहद से कुछ खास होता है।

अब  परंपरा की ओर रुख

बीते कुछ सालों से स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से आदिवासी अंचल में स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया। समूहों में प्रशिक्षित किए गए आदिवासी परिवार शहद इकट्ठा करने लगे। जिसके खरीदार समूहों पर नियंत्रण करने वाली संस्था करती है। सामान्य प्रक्रिया के बाद बाजार में पहुंचती है 'मेवाड़ की मिठास'।

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