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ये गांव की गुडि़या अंगुलियों के इशारों पर नचा रही कठपुतली, पुश्तैनी कला को जीवित करती महिलाएं, देखें वीडियो

Patrika news network Posted: 2017-06-17 01:49:33 IST Updated: 2017-06-17 17:27:05 IST
  • यूं तो बरसों से कठपुतली का रोल लोगों के मनोरंजन का जरिया बना हुआ है। एक अरसे तक राजे-रजवाड़े अपने मनोरंजन के लिए इस विधा के कलाकारों को प्रश्रय देते रहे।

राकेश शर्मा 'राजदीप'/ उदयपुर.

यूं तो बरसों से कठपुतली का खेल लोगों के मनोरंजन का जरिया बना हुआ है। एक अरसे तक राजे-रजवाड़े अपने मनोरंजन के लिए इस विधा के कलाकारों को प्रश्रय देते रहे। कालान्तर में राजप्रासादों से निकली यह कला आमजन के आनंद और प्रचार-प्रसार का माध्यम भी बन गई। सैकड़ों सालों से पीढ़ी-दर पीढ़ी इस कला को इन्होंने जीवित रख कर देश-दुनिया में अलग पहचान दिलाई है। ये दीगर बात है कि वर्तमान में इस पुश्तैनी कला से जुड़ी युवा पीढ़ी कठपुतली गढऩे, सजाने और नचाने की जगह लकड़ी-कपड़े के खिलौने बनाने, शादी-पार्टियों में ढोल-बांकिया बजाने तथा लोकनृत्य करने में अधिक रुचि लेने लगी है। बहरहाल, इस खानदानी पेशे से संबद्ध कठपुतली कला का सालों-साल से घर के पुरुष सदस्य ही निभाते देखे गए हैं। महिलाएं ज्यादातर लोकगीतों को गाने तथा पुतली कला की कहानियों को गाकर सुनाने की भूमिका निर्वाह करती रही। यानी पुतलियों को मंच पर अंगुलियों के इशारों पर नचाने का जिम्मा सदैव पुरुषों पर रहा। लेकिन पहली बार शिल्पग्राम में एक युवती को कठपुतली नचाते देख हैरानी हुई।


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हालांकि, छोटी जगह होने से नागौर जिले में बड़े काम और पैसा तो नहीं मिलता लेकिन, कई पैसे वालों के यहां जन्मदिन पार्टी, सगाई समारोह के अलावा स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार में अपनी पुश्तैनी कला का उपयोग करती ज्योति भाट संभवतया मांगणियार कलाकार रुकमाबाई के बाद पहली एेसी महिला है जो पेशेवर तरीके से पारम्परिक कला से जुड़ी है। जिझासावश पूछा तो बोली- 'मेरा नाम ज्योति भाट है। पुरखे मूलत: छोटी खाटू, जिला नागौर से हैं। बचपन से पिता पूरणमल और ग्यारसी देवी के साथ कठपुतली खेलों में शामिल रही। शिक्षा के नाम पर बस यही जमा पूंजी है। आठ भाई बहिनों में सबसे छोटी और विवाहित हूं। पिता की मृत्यु के बाद पिछले दो साल से खेल दिखाने का काम कर रही हूं। ये पूछने पर कि एक लड़की, वो भी शादी-शुदा होकर जगह-जगह कठपुतली खेल दिखा रही है...कभी दिक्कत नहीं महसूस हुई? ...वो कहती हैं - 'दिक्कतें तो आती ही है जब परिवार और समाज की मान्यताओं से हटकर कोई काम करते हैं। ...ये सच है कि हमारे समाज में मुझसे पहले किसी लड़की या महिला ने कठपुतली नहीं नचाई। पिता के बाद मेरी मजबूरी कहिए या रुचि, मेरी माता को सहारा देने के लिए मेरे पास इससे अच्छा कोई विकल्प नहीं था। क्योंकि बड़े भाई अलग-अलग राज्यों में कमा खा रहे हैं। बड़ी बहनें अपने ससुराल के कामों में हाथ

बंटा रही हैं। एेसे में स्थानीय ससुराल होने से सिर्फ मैं ही मां की देखरेख इस तरह कर सकती थीं।Óजगह-जगह घूमना परेशानी ज्योति बताती है कि कार्यक्रम के सिलसिले में गृहनगर से बाहर जाकर रहने में समस्या बढ़ती है। इसीलिए कोशिश करते हैं छोटी खाटू और आसपास क्षेत्रों में ही अवसर मिलते रहें। एक पीड़ा हमेशा मन में रहती है काश, थोड़ा बहुत पढ़लिख जाते...तो कला के प्रस्तुतिकरण में नई तकनीक और शैली से इसे और प्रभावी बना पाते। 


हालांकि, छोटी जगह होने से नागौर जिले में बड़े काम और पैसा तो नहीं मिलता लेकिन, कई पैसे वालों के यहां जन्मदिन पार्टी, सगाई समारोह के अलावा स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार में अपनी पुश्तैनी इस कला के उपयोग करती ज्योति भाट संभवतया मांगणियार कलाकार रुकमाबाई के बाद पहली एेसी महिला है जो पेशेवर तरीके से पारम्परिक कला से जुड़ी है।

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