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दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो रास्ते खुद ब खुद खुल जाया करते है...कुछ एेसा ही कर दिखाया है शेखावाटी की निर्भिक लाडो ने...

Patrika news network Posted: 2017-07-13 12:28:05 IST Updated: 2017-07-13 12:28:05 IST
दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो रास्ते खुद ब खुद खुल जाया करते है...कुछ एेसा ही कर दिखाया है शेखावाटी की निर्भिक लाडो ने...
  • दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो रास्ते खुद ब खुद खुल जाया करते हैं। संसाधनों का अभाव होते हुए भी राहें मंजिल तक पहुंचा देती हैं।

सीकर

दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो रास्ते खुद ब खुद खुल जाया करते हैं। संसाधनों का अभाव होते हुए भी राहें  मंजिल तक पहुंचा देती हैं। कुछ  एेसा ही कर दिखाया है सीकर जिले की एक निर्भिक लाडो ने जो कि, बिना किसी सरकारी सुविधा के थाईलैंड व बांग्लादेश की विदेशी धरती तक पहुंची और रोलबॉल जैसे महंगे खेल में नाम कमाकर वल्र्ड चैंपियनशिप में गोल्ड व एशियन चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल पर कब्जा जमाया है। जी हां, हम बात कर रहे हैं श्रीमाधोपुर की खिलाड़ी रिंकू सोनी की। जिसने 19 साल की छोटी उम्र में ही बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सबको चौका दिया है। हालांकि बीकॉम तृतीय वर्ष की इस महिला खिलाड़ी को यहां तक पहुंचने में किसी भी प्रकार की कोई सरकारी सहायता व सुविधा नहीं मिली। लेकिन, संघर्ष को जारी रखते हुए इसने हार नहीं मानी और रोलबॉल में लगातार उम्दा प्रदर्शन करते हुए सफलता को चूमा। रोलबॉल एसोसिएशन की ओर से रानी लक्ष्मी बाई व भरत अवार्ड हासिल किया। रोलबॉल की एक्सपर्ट बतौर रिंकू का कहना है कि अंतराष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं में प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त करने वालों को राज्य सरकार पांच व तीन लाख रुपए देती है। लेकिन, सरकारी स्तर पर खेल में उसे पहले भी कोई सहायता मुहैया नहीं कराई गई और पुरस्कार के तौर पर बाकी की राशि भी उसे अभी तक उपलब्ध नहीं कराई गई है। 


एेसे छुई बुलंदी 


2011- पहली बार स्टेट चैंपियनशिप में बतौर कप्तानी टीम का नेतृत्व किया। 

इससे पहले जिला स्तर पर कई मेडल हासिल किए और खेल को जिंदा रखा। इसके अलावा पूणे में नेशनल लीग व मुंबई टाइगर की टीम से रोलबॉल में शामिल हुई। 

2016- थाईलैंड में आयोजित सैकंड एशियन रोलबॉल चैंपियनशिप में दूसरा स्थान पर रहते हुए सिल्वर मेडल पर कब्जा जमाया। 

2017- बांग्लादेश में हाल ही आयोजित फोर्थ रोलबॉल वल्र्ड चैंपियनशिप में पहला स्थान और गोल्ड मेडल हासिल करना। 

दादा ने बदली सोच


रिंकू  ने बताया कि उसके दादा मक्खनलाल सोनी ने बेटियों के प्रति पुरानी सोच को बदलते हुए उसे खेल में आगे बढ़ाया। जीवन में कुछ कर दिखाने का जज्बा पैदा किया। खेल के नियमित छह घंटे के अभ्यास के दौरान पिता निरंजनलाल व माता मीना ने भी उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति की। प्रेरणा के बल यहां पहुंची हूं। 

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