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दो बेटी नेत्रहीन, पहले दोनों को पढ़ाया, अब नेत्रहीनों में जगा रहीं शिक्षा की अलख

Patrika news network Posted: 2016-12-01 19:51:14 IST Updated: 2016-12-01 19:51:40 IST
दो बेटी नेत्रहीन, पहले दोनों को पढ़ाया, अब नेत्रहीनों में जगा रहीं शिक्षा की अलख
  • दो बच्चों से एक वर्ष पहले शुरू किया सफरजिले के अन्य नेत्रहीनों की जिदंगी संवारने के लिए निर्मला व सुरेश जांगिड़ ने दिव्य ज्योति दृष्टिहीन कल्याण समिति का गठन किया। उन्होंने बताया कि शुरुआत में सीकर शहर के दो नेत्रहीन विद्यार्थी मिले। इसके बाद विद्यार्थी जुड़ते गए। इस दौरान कई मुसीबत भी आई।

अजय शर्मा, सीकर.

यदि व्यक्ति के मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो मुसीबत खुद राह से हट जाती है। यह एक महिला और उसकी दो बेटियों की संघर्ष की कहानी है। जन्मजात दो बेटियों के नेत्रहीन होने पर सब चिन्ता मेंथे। लेकिन बसंत विहार निवासी निर्मला शेखावत ने इस परेशानी को संघर्ष के दम पर सफल कहानी बनानी की ठान ली। पहले बेटी रिन्कू शेखावत व आशा को पढ़ाया। लेकिन इस राह में मुसीबत यह थी कि आखिर पढ़ाए कहां जाए। क्योंकि सीकर जिले में एक भी नेत्रहीन स्कूल नहीं था। आखिर में दोनों बेटियों को दिल्ली के एक नेत्रहीन विशेष विद्यालय में दाखिला दिलवाया। बेटियों के नौकरी लगने पर अब निर्मला शेखावत ने कुछ सहयोगियों की मदद से बसंत विहार में जिले का पहला नेत्रहीन विशेष स्कूल खोला है। इससे शेखावाटी के नेत्रहीन विद्यार्थियों में नई उम्मीद जगी है।

फिलहाल विद्यालय में 17 नेत्रहीन विद्यार्थी अध्ययनरत है। इनमे से कई यही छात्रावास में रहते है।

हर महीने 60 हजार का खर्चा

संस्था के कोषाध्यक्ष मुकेश सैनी का कहना है कि छात्रावास व विद्यालय में हर महीने औसत 60 हजार रुपए का खर्चा होता है। फिलहाल कोई सहायता नहीं मिलने के कारण संस्था के पदाधिकारी आपस में बांट लेते है। एक निजी कंपनी में काम करने वाले सैनी खुद नेत्रहीन बच्चों को कम्प्यूटर के जरिए पढ़ाई कराते है। वहीं दो वीआई के विशेष शिक्षक ब्रेललिपि से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। दोनों बेटियों ने पाया मुकामसंस्था अध्यक्ष निर्मला शेखावत की बड़ी बेटी आशा शेखावत कई कंपनियों में कार्य कर रही चुकी है। फिलहाल वह रेलवे की तैयारी में जुटी है। वही छोटी बेटी रिन्कू शेखावत जयपुर स्थित एसबीआई बैंक में मैेनेजर के पद पर कार्यरत है। उनका कहना है कि दुनिया के सभी नेत्रहीन पढ़-लिखकर मुकाम हासिल कर सके। इसलिए जिले में विद्यालय संचालित करने का मन बनाया।

पहला नेत्रहीन स्कूल

सीकर में मूक बधिर व मानसिक विकलांग विद्यार्थियों के लिए तो कई सामाजिक संस्थाआें की ओर से विशेष विद्यालय संचालित किए जा रहे है। लेकिन नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए कोई स्कूल नहीं था। एेसे में विद्यार्थियों को मजबूरन श्रीगंगानगर, जोधपुर, अजमेर व दिल्ली सहित अन्य राज्यों पढ़ाई के लिए जाना पड़ता है।

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