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राजस्थान चुनाव : फिर जनता को ठगने का बनने लगा समीकरण, पढ़ें इस बार कौन-कौन से तरीका अपना रहे नेता

Patrika news network Posted: 2017-04-17 15:47:12 IST Updated: 2017-04-17 15:47:12 IST
राजस्थान चुनाव : फिर जनता को ठगने का बनने लगा समीकरण, पढ़ें इस बार कौन-कौन से तरीका अपना रहे नेता
  • बढ़ती गर्मी के बीच शेखावाटी में सियासी पारा भी बढ़ता जा रहा है। कही सियासी लू के थपेड़े हैं तो कही तपती दोपहरी में रेत जैसी खामोशी। विधानसभा चुनाव भले ही नजदीक हो लेकिन सियासी दलों में अंदरखाने अभी से दांव-पेंच आजमाना शुरू कर दिया है।

सीकर

बढ़ती गर्मी के बीच शेखावाटी में सियासी पारा भी बढ़ता जा रहा है। कही सियासी लू के थपेड़े हैं तो कही तपती दोपहरी में रेत जैसी खामोशी। विधानसभा चुनाव भले ही नजदीक हो लेकिन सियासी दलों में अंदरखाने अभी से दांव-पेंच आजमाना शुरू कर दिया है। राजस्थान पत्रिका टीम ने जिले की आठों विधानसभा क्षेत्र के लोगों से बातचीत की तो कई तरह के समीकरण नजर आए। कही पार्टी के बढ़ते वोट बैंक पर गुटबाजी हावी है तो कही आरोप-प्रत्यारोप के बीच सियासत का दौर जारी है। पेश है पत्रिका की विशेष रिपोर्ट।


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सीकर : घोषणाओं में पिछड़े

सीकर विधानसभा की सियासत भी इन दिनों बदली हुई है। क्योकि सत्ताधारी पार्टी घोषणाओं में पूरी तरह पिछड़ गई है। कड़ी से कड़ी जुडऩे पर लोगों में  मिनी  सचिवालय, ऑडिटोरियम, नवलगढ़ रोड पुलिया फोरलेन, जनाना अस्पताल व मेडिकल कॉलेज को लेकर उम्मीद जगी है। लेकिन ज्यादातर घोषणा अभी तक पूरी नहीं हुई है। जिला मुख्यालय की सीट होने के बाद भी नेता खाली हाथ है। दूसरी तरफ कांग्रेस भी विपक्ष की जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह सफल नहीं रही।


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धोद: वर्षों पुरानी मांग अभी भी दूर 


प्याज मंडी को लेकर यहां सियासत तेज है। प्याज मंडी की वर्षों पुरानी मांग अभी तक धरातल पर नहीं आ सकी। प्याज के भाव नहीं मिलने के कारण लोगों में आक्रोश भी है। रसीदपुरा प्याज मंडी व बिजली दरों में बढ़ोतरी के मामले को माकपा ने पूरी तरह भुनाया। वहीं कांग्रेस दोनों मामलों में काफी पिछड़ती हुई नजर आ रही है। हालांकि भाजपा ने बिजली दर कम होने पर किसानों से वाहीवाही लेने की कोशिश की लेकिन प्याज मंडी की टूटती उम्मीद ने यह भी छीन लिया।



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नीमकाथाना: कुछ खास नहीं

विकास के नाम पर अभी कुछ बड़ा काम नहीं हुआ है। खराब सड़क नेटवर्क यहां बड़ा मुद्दा है। सियासी हिसाब से देखे तो कांग्रेस और भाजपा पूरी तरह चुनावी मूड में है। भाजपा नेताओं ने तो एक टीम बनाकर अभी से गांव-ढाणियों में अभियान शुरू कर दिया है। वहीं कांग्रेस पर गुटबाजी का असर साफ नजर आ रहा है। माकपा की सक्रियता ने दोनों दलों की परेशानी बढ़ा दी है।


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खण्डेला: अपनी मांग पर नहीं लगवा सके मुहर 

चिकित्सा राज्य मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में मुद्दों पर सियासत हावी है। रींगस में ट्रोमा सेंटर काफी पुरानी मांग है। इस बार इस महकमे की कमान भी विधायक को मिली। लेकिन मंजूरी दिलाने में फेल रहे। विधानसभा क्षेत्र में पेयजल प्रोजेक्ट भी बड़ा मुद्दा है। यहां कांग्रेस का एक गुट पूरी तरह शांत है। दूसरा अभी से पुराने नारे को दोहरा रहा है।


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दांतारामगढ़: गहरी है खामोशी

सरकारी कॉलेज को मंजूरी दिलाने का मामले ने तूल पकड़ रखा था। लेकिन अभी सियासत में गहरी खामोशी है। भाजपा ने पिछले चुनाव में दूसरे जिले के नेता को चुनाव मैदान में उतरा। इसके बाद से अन्य वर्ग के नेता काफी सक्रिय है। वहीं माकपा नेता अगले मिशन के लिए अभी से जुटे है।


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फतेहपुर: कब होगी पानी की निकासी 

कस्बे में पानी निकासी वर्षों पुराना मुद्दा है। हर चुनाव में बारिश के पानी निकासी के दावे भी खूब किए। लेकिन जनता को राहत कही  नजर नहीं आ रही है। यहां की स्थिति अन्य विधानसभा क्षेत्रों से काफी अलग है। यहां भाजपा में पूरी तरह खामोशी है। जबकि कांग्रेस में काफी उठापटक का दौर चल रहा है। कई दावेदार तो अपने आप को प्रत्याशी मानकर जी जान से जुटे हैं। जबकि समीकरण कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। आगामी दिनों में यहां की सियासत का पारा और चढ़ेगा।


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लक्ष्मणगढ़: पुरानी घोषणाएं भी अधूरी 

इलाके के लोगों को अभी तक कांग्रेस राज की घोषणा पूरी होने का इंतजार है। इसलिए यहां फिलहाल मुद्दों से ज्यादा अंदरखाने की राजनीति हावी है। भाजपा की सुस्ती का फायदा सीधे तौर पर कांग्रेस को मिल रहा है। तीनों दलों की नजर यहां गांव-ढाणियों के लोगों पर है। आज भी यहां पेयजल, अटके बिजली कनेक्शन व सीवरेज बडे़ मुद्दे है। राजनैतिक जानकारों का कहना है कि शहरी मतदाताओं की चुनावी बिसात तो चुनाव के समय ही जमती है।

श्रीमाधोपुर


यहां पिछले दस वर्ष से पानी को लेकर राजनीति हो रही है। लेकिन कोई भी इलाके के लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका। हालांकि मुख्यमंत्री ने बजट में घोषणा जरूर की है। लेकिन कार्य पटरी पर नहीं आ रहा है। कांग्रेस भी यहां भाजपा की कमजोरी को भुनाने में पूरी तरह विफल रही है। सरकारी कॉलेज की मांग भी यहां वर्षो पुरानी है। एेसे में युवाओं की उम्मीद टूट रही है।

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