कभी पैंथर तो कभी मानव चढ़ रहा बलि, आखिर कब खत्म होगा मानव-वन्यजीव संघर्ष, देखें वीडियो

Patrika news network Posted: 2017-02-15 10:36:31 IST Updated: 2017-02-15 10:36:31 IST
  • जिले में लगातार मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता जा रहा है। पिछले एक साल में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुई जो मानव और वन्यजीव के संघर्ष को दर्शाती हैं।

राजसमंद.

जिले में लगातार मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता जा रहा है। पिछले एक साल में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुई जो मानव और वन्यजीव के संघर्ष को दर्शाती हैं। जब घटनाएं होती हैं तो वनविभाग के पास महज पिंजरा लगाने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है। यहां तक की एक रेस्क्यू टीम भी नहीं है, जो इस संघर्ष को समाप्त करने में कड़ी का काम कर सके। लोगों को पैंथर के स्वभाव के बारे में समझा सके और संघर्ष की घटना पर तुरंत मौके पर पहुंचकर दोनों का जीवन सुरक्षित कर सके।

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यहां 310 वर्ग किमी का वन्यजीव अभयारण्य है। 15917.76 हेक्टयर अन्य वन भूमि है जिसमें अनगिनत पैंथर, भालू, भेडिय़ा जैसे हिंसक वन्यजीव रहते हैं। आए दिन इंसानों और इनके बीच संघर्ष होता है। कभी यह मारे जाते हैं तो कभी इंसान। लेकिन विभाग दोनों ही स्थिति में पंगु बना रहता है क्योंकि घटना के बाद तुरंत सूचना नहीं मिलती और मिलती भी है तो विभाग के पास रेस्क्यू टीम नहीं होने से वह कोई कदम नहीं उठा पाते। जबकि इनके पास करीब-करीब सभी उपकरण हैं। जाल, पिंजरा, रस्सी, सीढ़ी, यहां तक की ट्रेंकुलाइज गन भी। लेकिन बिना रेस्क्यू टीम के इसका इस्तेमाल नहीं हो पाता। 

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जब रेस्क्यू की आवश्यकता होती है तब यहां से साजो-सामान लेकर वनविभाग की टीम पहुंचती है, और मौके पर इंतजार करती है कि कब उदयपुर से दल आए और ऑपरेशन आगे बढ़े। यहां वन्यजीवों में सबसे अधिक पैंथर और मानव संघर्ष है। वर्ष में औसत 7 से 8 बार ऐसी घटनाएं होती हैं जिसमें पैंथर मारा जाता है या फिर जनहानि होती है। उसके बाद भी विभाग के पास इस संघर्ष को कम करने की कोई ठोस योजना नहीं है।      


                                                            संघर्ष कम करने उपाय

-लोगों को ज्यादा से ज्यादा पैंथर के स्वाभाव के बारे में जानकारी दी जाए।

-मार्बल खनन के बाद खानों का भराव करवाया जाए। ताकि पैंथर यहां अपना बसेरा नहीं बना सके।

-पैंथर संभावित क्षेत्रों में विभाग को अस्थाई तौर पर ऐसे लोग लगाने चाहिए जो विभाग को पैंथर या संघर्ष की समय पर सूचना दे सके। 

-पैंथर संभावित क्षेत्रों में विशेष जागरूकता कार्यक्रम करवाए जाएं।

-जिले में रेस्क्यू टीम का गठन किया जाए ताकि  लोगों का विभाग के प्रति विश्वास बढ़े। लोग पैंथर से स्वयं निपटने की बजाए विभाग को सूचना दें।

-समय-समय पर विशेषज्ञों को पैंथर सम्भावित क्षेत्रों का दौरा करवाया जाए तथा गांव में उनकी बैठक करवाई जाए। 

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