PALI: यहाँ साढ़े तीन सौ वर्ष से भरा जा रहा है माता के दरबार में मेला

Patrika news network Posted: 2017-03-19 14:36:51 IST Updated: 2017-03-19 17:30:49 IST
  • - आदर्श नगर में करीब साढ़े तीन सौ साल पहले हुआ था मंदिर का निर्माण

पाली. आदर्श नगर स्थित शीतला माता के मंदिर पर करीब साढ़े तीन सौ साल पहले से शीतला सप्तमी पर मेला भरने की शुरुआत हुई थी, जो आज तक कायम है।

मंदिर में सप्तमी के सूर्योदय से पहले ही रात बारह बजे से महिलाएं पूजन करने आती है। मंदिर में विराजमान शीतला माता, अचबड़ा माता व ओरी माता का पूजन कर खुशहाली की कामना करती हैं। यूं तो शहर में आज रामदेव रोड, मानपुरा भाखरी क्षेत्र, गोल निम्बड़ा आदि क्षेत्रों में शीतला माता के मंदिर बन गए है, लेकिन शीतला सप्तमी पर पूजन करने के लिए आदर्श नगर स्थित मंदिर में ही सबसे अधिक महिलाएं उमड़ती है।

पहले सोजत जाते थे श्रद्धालु

शीतला माता का मेला पहले सोजत में भरता था। लोग शहर से वहां पूजन करने जाते थे। एेसा करना हर व्यक्ति के लिए कई बार संभव नहीं हो पाता था। इस पर आदर्श नगर में करीब साढ़े तीन सौ साल पहले शीतला माता मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर के पुजारी दीपक रावल ने बताया कि प्रारम्भ में यह मंदिर कच्चा था। यहां रावल परिवार के लोग पूजा करते थे। मंदिर का बाद में आदर्श नगर निवासियों के सहयोग से जीर्णोद्धार करवाया गया था।

55 साल पहले हुई गेर की शुरुआत

आदर्श नगर में शीतला सप्तमी पर भरने वाले मेले में करीब पचास-पच्चपन वर्ष पहले गेर नृत्य की शुरुआत हुई थी। उस समय पांच-सात गेर दल माता को रिझाने के लिए मंदिर के चारों तरफ समूह में नृत्य करते थे। अब गेर नर्तक मंदिर के सामने स्थित चौक में नृत्य करते हैं और फिर अम्बेडकर सर्किल की ओर जाने वाले से आगे बढ़ जाते हैं।

श्रेष्ठ नर्तकों का करते थे सम्मान

यहां भरने वाले मेले की व्यवस्था बाद में नगर परिषद ने संभाल ली। उस समय यहां नृत्य करने आने वाले नर्तकों व गेर दलों का परिषद की ओर से सम्मान किया जाता था, लेकिन बाद में गेर दलों के बीच विवाद होने पर यह परम्परा बंद कर दी गई। इसके बाद सभी गेर दलों को गुड़ की भेली व झण्डा देकर तथा दल मुखिया का साफा बांधकर सम्मान किया जाना लगा।

महिलाएं गाती हैं गीत

शीतला सप्तमी पर माता का पूजन करने के साथ ग्रामीण अंचल की कई महिलाएं आटे में हल्दी मिलाकर हांडी, ओरिया, बेलन व चम्मच आदि खिलौने बनाती हैं। माता का पूजन करते समय 'माता जीमो थै दही नै घाट...Ó जैसे गीत गाती हैं। इन गीतों के माध्यम से महिलाएं माता को भोजन करने का आग्रह करने के साथ बच्चों को बीमारी से बचाने की प्रार्थना करती हैं।

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