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हमारी इस कामयाबी की दुनिया में धाक

Patrika news network Posted: 2017-02-16 10:53:22 IST Updated: 2017-02-16 10:53:38 IST
हमारी इस कामयाबी की दुनिया में धाक
  • अंतरिक्ष अनुसंधान को हमारे यहां कितना महत्व दिया जाता है इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि आम तौर पर अंतरिक्ष अनुसंधान से संबंधित महकमा प्रधानमंत्री की सीधी निगरानी में रहता आया है।

पल्लव बागला

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक साथ 104 उपग्रह प्रक्षेपित कर विश्व कीर्तिमान बनाया है। हम याद करें कि इसरो ने जब अपना पहला उपग्रह छोड़ा था तो उसे  प्रक्षेपण स्थल पर बैलगाड़ी से लाना पड़ा था। बैलगाड़ी से शुरू हुआ यह सफर उपग्रह प्रक्षेपण के शतक तक पहुंच गया है। 



अंतरिक्ष अनुसंधान को हमारे यहां कितना महत्व दिया जाता है इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि आम तौर पर अंतरिक्ष अनुसंधान से संबंधित महकमा प्रधानमंत्री की सीधी निगरानी में रहता आया है। आज जो उपग्रह छोड़े गए उनमें भारत के सिर्फ तीन ही हैं बाकी अन्य देशों के हैं जिनमें इजरायल, अमरीका और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश शामिल हैं। 



यह मानना ही होगा कि अंतरिक्ष के व्यावसायिक बाजार में भारत की धाक जमी है और वह पिछले कुछ समय में ही अंतरिक्ष बाजार में भरोसेमंद खिलाड़ी बन कर उभरा है। इसका बड़ा कारण यह भी है कि भारत कम से कम लागत में उपग्रह प्रक्षेपित करता है। 



हालांकि चीन, भारत से भी सस्ते में  उपग्रह भेज रहा है। इसकी वजह चीन का अंतरिक्ष अभियान सेना के द्वारा संचालित होना है। चीन भी अब बाजार की दृष्टि से अंतरिक्ष अभियान संचालित कर रहा है। उसके पास सैटेलाइट लांच करने की क्षमता भारत से अधिक है। 



शुरू में हमारी गति धीमी रही, आज हालत यह है कि कई निजी कंपनियां भारत से ही उपग्रह प्रक्षेपित करा रही हैं क्योंकि भारत का लॉन्चर पीएसएलवी काफी भरोसेमंद है। एक तरह से भारत ने इस मामले में चीन को भी चुनौती दे रखी है। निजी कंपनियां चीन की बजाए भारत की तरफ आकर्षित हो रही हैं। आने वाले समय में चीन और भारत के बीच अंतरिक्ष के लिए वही होड़ देखने को मिल सकती है जो किसी समय अमरीका -सोवियत संघ के बीच हुआ करती थी। 



अभी भेजे गए उपग्रहों में ज्यादातर छोटे आकार के हैं जिनका वजन 2-2.5 टन का है। व्यावसायिक बाजार बड़े उपग्रहों का है जिनका वजन 5-6 टन का होता है। भारत को इसमें भी पकड़ बनानी होगी। आने वाले समय में 2-3 किलोग्राम तक के छोटे उपग्रहों का बाजार होगा। 



इसका कारण यह है कि एक तो इनकी लागत कम आती है और दूसरा ये नष्ट हो जाएं तो ज्यादा नुकसान नहीं उठाना पड़ता। इसरो को अतंरिक्ष बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत करने के लिए निजी क्षेत्र की सहभागिता भी करनी होगी। इस तरह का सहयोग व्यावसायिक बाजार में इसरो के लिए और अधिक कामयाबी की संभावनाओं के द्वार खोल सकता है।




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