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Video: पढ़िए नरेंद्र कोहली द्वारा रचित महासमर, भाग-35

Patrika news network Posted: 2017-03-16 15:50:36 IST Updated: 2017-03-16 15:50:36 IST
  • यदि सत्यवती और पराशर का विवाह हो जाता और कालान्तर में धन के अभाव में उसे कोई असुविधा होती तो उसका सारा रोष अपने तपस्वी पर ही बरसता। तब यदि उनमें झगड़ा होता... दोनों का साथ रहना यातनापूर्ण हो जाता...

पर सत्यवती का चिन्तन एक ही स्थान  पर स्थिर नहीं रह सका...उसके अपने ही मन में एक विरोधी स्वर उठा: वह यह क्यों मानती है कि उसकी इच्छा होने पर भी प्रकृति ने उसे पराशर से नहीं मिलाया... बाबा से बात कर, उसकी अपनी इच्छा ही तो शिथिल हो गई थी... उसने बाबा की इच्छा के साथ अपनी इच्छा का तादात्म्य कर दिया था... बाबा मानते थे कि धन के अभाव में तपस्वी के साथ उसका जीवन सुखद नहीं होगा... सम्भव है कि ऐसा ही होता। 



यदि सत्यवती और पराशर का विवाह हो जाता और कालान्तर में धन के अभाव में उसे कोई असुविधा होती तो उसका सारा रोष अपने तपस्वी पर ही बरसता। तब यदि उनमें झगड़ा होता... दोनों का साथ रहना यातनापूर्ण हो जाता... तो क्या उसके स्थान पर प्रकृति ने ठीक निर्णय नहीं किया? उसका प्रिय उसे नहीं मिला, किन्तु उसका प्रिय, अप्रिय तो कभी नहीं होगा।



तो क्या शान्तनु की रानी बनना ही उसके लिए हितकर था?... एक समवयस्क, संबुद्धि और सजातीय वर उसके हित में नहीं था.... शायद नहीं... बाबा के ही समान, सत्यवती के मन में भी कहीं गहरे वैभव और सत्ता की भूख थी... प्रकृति ने उसे वही दे दिया, जो सत्यवती ने चाहा था... कुछ पाने के लिए उसका मूल्य भी चुकाना ही पड़ता है। सत्यवती ने सुख-सुविधाओं के लिए अपने प्यार का मोल चुकाया है...



प्रकृति ने उसकी इच्छा पूरी की है या उसका हित साधा है? या क्या उसकी इच्छा और हित- साधन मिलकर एक हो गए हैं?... और देवव्रत भीष्म!... क्या इस प्रौढ़ पति के पुत्र के रू प में भीष्म को पाना भी उसके हित में था?...

बाबा ने कहा था, ‘भीष्म से सावधान रहना। वही तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है।...’

उसकी इïच्छा पूरी हुई है या प्रकृति की?

सत्यवती कुछ भी समझ नहीं पा रही थी।



‘हमारी सन्तान को शस्त्रों और शास्त्रों की शिक्षा कौन देगा?’ सत्यवती ने इतने सहज रू प में पूछा, जैसे दैनिक कार्यक्रम सम्बन्धी कोई प्रश्न हो।



कुछ क्षणों तक शान्तनु कुछ समझ ही नहीं पाये: किसकी बात कर रही है सत्यवती? भीष्म को अब क्या शस्त्रों और शास्त्रों के शिक्षण की आवश्यकता है? ... पर सहसा उनकी दृष्टि सत्यवती के चेहरे पर टिक गई: सत्यवती अब साधारण निषाद- कन्या नहीं रह गई थी। सैरिंध्रियों की कला तो अपना कार्य करती ही रही थी, पर शिक्षिकाओं ने उसकी रुचि के परिष्कार और विकास में भी कम श्रम नहीं किया था। और सबसे महत्त्वपूर्ण तो सत्यवती की अपनी ग्रहण शक्ति थी। जिस तीव्रता से उसने स्वयं को अपने नए वातावरण में ढाला था, वह अद्भुत थी। कुछ वर्षों में तो शायद कहने पर भी कोई विश्वास न करे कि सत्यवती का जन्म राज- परिवार में नहीं हुआ था और उसका पालन-पोषण एक निषाद के आंगन में हुआ था।... और उसके चेहरे का यह उल्लास... क्या कहा था उसने... हमारी सन्तान को...



‘सत्या! क्या तुम मां बनने वाली हो?’

सत्यवती ने कटाक्ष से शान्तनु को देखा और स्वीकृति में सिर झुका लिया।



शान्तनु का मन हुआ, तत्काल भीष्म को बुलाएं और उसे पिता के सच्चे हृदय से आशीर्वाद दें।... उन्होंने उससे कहा था, ‘एक पुत्र का पिता, सन्तानहीन व्यक्ति जैसा होता है।’... उसने अपना सर्वस्व त्याग कर उन्हें दूसरी सन्तान प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध करा दिया।... उन्हें लगा कि उनका मन, भीष्म के आभार में इतना विगलित हो गया है, कि कहीं भीष्म उनके सामने आ खड़ा होता तो राजा और पिता- दोनों की मर्यादा भूलकर, वे पुत्र के चरणों में ही लोट जाते।

‘आपने बताया नहीं।’ सत्यवती ने अपना झुका हुआ सिर उठाया।

शान्तनु ने अनुभव किया, हृदय की गद्गदावस्था से उनकी आंखें भीग आयी हैं।



‘मैं अभी दूसरी सन्तान का मुख देखने की संभावना की विह्वल अवस्था से ही उबर नहीं पाया और तुम सन्तान की शिक्षा-दीक्षा तक पहुंच गयीं।’

‘आपकी होगी दूसरी सन्तान।’ सत्यवती अनियन्त्रित आवेग के साथ बोली, ‘मेरी तो पहली ही है न!’

कहने को तो वह कह गयी, पर कहते ही जैसे उसके दांतों ने उसकी जीभ काट ली: ‘मूर्खे! कृष्ण द्वैपायन को भूल गई तू? इतनी जल्दी?’



सत्यवती का हृदय उमड़ा। मन में आया कि तत्काल राजा को बता दे, कि उसका एक कानीन पुत्र भी है- कृष्ण द्वैपायन! वहां, यमुना के उस द्वीप पर, तपस्वी की कुटिया में पल रहा है। राजा उसका मस्तक सूंघकर उसे अपना पुत्र स्वीकार कर लें। आखिर वह उन्हीं के क्षेत्र से उत्पन्न सन्तान है, फिर वह शान्तनु का पुत्र क्यों नहीं हो सकता?



पर जैसे उसी क्षण उसके विवेक ने उसे फटकारा, ‘सत्यवती! पागल मत बन! तू राजा के औरस पुत्र, कुरुवंश के युवराज, भीष्म को अपना पुत्र नहीं मान पायी, तो राजा तेरे कृष्ण द्वैपायन को कैसे अपना पुत्र स्वीकार कर लेगा।... कहीं यह न हो कि राजा कुपित हो जाए, और तेरी इस अजन्मी सन्तान को भी अपनी सन्तान न माने। ऐसा न हो कि अपनी पहली सन्तान को राज-वैभव दिलाने के प्रयत्न में वह अपनी दूसरी, इस अजन्मी सन्तान को भी वंचित कर दे... तपस्वी ने कहा था, क्षत्रिय राजा कानीन सन्तान को सम्मानजनक नहीं मानते। 



बाबा ने भी संकेत किया था कि वह राजप्रासाद में अपनी कानीन सन्तान की चर्चा न करे... यदि कहीं राजा को संदेह हो गया... और सन्देह उसे हो सकता है। राजा लोग इस विषय में तनिक भी उदार नहीं हैं। ईर्ष्या उनका सर्वप्रथम गुण है... उसे सन्देह हो गया, तो वह यही मानेगा कि सत्यवती की इस अजन्मी सन्तान का पिता भी वही तपस्वी है...’    




          

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