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आखिर कब तक?

Patrika news network Posted: 2017-04-29 07:36:06 IST Updated: 2017-04-29 07:36:31 IST
आखिर कब तक?
  • कश्मीर घाटी पहले ही उग्रवाद की आग में जल रही है। अब छत्तीसगढ़ भी फिर एक बार नक्सली हिंसा की चपेट में आता दिख रहा है। नक्सली हिंसा की ताजा घटना को जोड़ लें तो पिछले एक माह में सीआरपीएफ के 40 से ज्यादा जवान मारे जा चुके हैं।

गोविन्द चतुर्वेदी

कश्मीर घाटी पहले ही उग्रवाद की आग में जल रही है। अब छत्तीसगढ़ भी फिर एक बार नक्सली हिंसा की चपेट में आता दिख रहा है। नक्सली हिंसा की ताजा घटना को जोड़ लें तो पिछले एक माह में सीआरपीएफ के 40 से ज्यादा जवान मारे जा चुके हैं। पिछले 10-12 वर्षों की बात करें तो देश के नक्सल प्रभावित एक दर्जन राज्यों में सबसे ज्यादा घटनाएं भी छत्तीसगढ़ में हुई और उसी ने सबसे ज्यादा कीमत भी चुकाई है। मोटे आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में वहां करीब-करीब 2700 लोग मरे। वे चाहे सिविलियन थे या सुरक्षा बलों के जवान अथवा फिर नक्सली, थे तो सब भारतीय ही। तब प्रश्न उठता है  कि, आखिर यह सिलसिला कब तक चलेगा? कभी रुकेगा अथवा यूं ही माताएं-बहनें अपने लाड़लों को खोती रहेंगी या फिर उनका सिंदूर पुछता रहेगा, मासूम बच्चे अनाथ होते रहेंगे?


हमारी सरकारों को, चाहे वे किसी भी पार्टी की हों, कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री हो, उन्हें यह अहसास कब होगा कि, उनकी नीतियों में खोट है। तभी तो वे कुछ कर लें, मर्ज बढ़ता ही जा रहा है। अब घटना पर दु:ख प्रकट करने से अथवा उसे चुनौती मानने से शायद ज्यादा लम्बे समय काम न चले। मीटिंग-मीटिंग का खेल भी अब ज्यादा नहीं चलने वाला। जो परिवार अपना आदमी खो रहा है, उसका आक्रोश अब फटने लगा है। फिर चाहे आदिवासी हो या फिर सिविलियन। इससे पहले कि, सब के हाथों में हथियार आए, हमारी सरकारों को चेत जाना चाहिए। कुछ ऐसा ठोस करना चाहिए कि, उनका दर्द कम हो। उनमें विश्वास पैदा हो कि, सरकार हमारी है, हमारी सुन रही है और हमारे लिए काम कर रही है। आज यह विश्वास कहीं नजर नहीं आ रहा। न आदिवासी में और ना ही जवानों में।


नक्सलियों में तो होने का प्रश्न ही नहीं उठता। अगर यह भरोसा ही होता तो बस्तर के भोले-भाले आदिवासी, दूर महाराष्ट्र, तेलंगाना या आंधप्रदेश से आए किसी नक्सली नेता के कहने पर हथियार क्यों उठाते? सरकारों से लेकर तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं को इस प्रश्न पर अपने अंदर झांकना चाहिए। आखिर उनकी विश्वसनीयता को क्या हुआ? आदिवासी उन्हें अपना क्यों नहीं मानता है? घटना की निंदा और अधिक फोर्स के इस्तेमाल की रणनीतियां बनाने के बजाय क्योंकि उसमें मारे तो 'भारतीय' ही जाएंगे,  उसे भोले-भाले आदिवासियों को नक्सलियों से अलग करना चाहिए। उनके दिलों में सरकार के लिए 'अपनेपन ' का अहसास जगाकर उनके लिए रोजगार और अच्छी मजदूरी की व्यवस्था करनी चाहिए। विकास का होना ठीक है लेकिन उनमें यह विश्वास भी होना चाहिए कि, उससे उनकी रोजी-रोटी नहीं छिनेगी। उनका खेत नहीं छिनेगा। जब उसे लगता है कि, सरकार पूंजीपतियों के लिए जबरन उसका खेत छीन रही है, उसकी जमीन छीन रही है, तब 'मरता क्या न करता' की तर्ज पर वह हथियार उठाता है। चम्बल के डाकूओं की तरह बागी हो जाता है। सरकार को उसे यह भरोसा दिलाना ही होगा कि, उसके लिए आदिवासी की जान भी उतनी ही प्यारी है जितनी सुरक्षा बलों के जवान की। मानवाधिकार आदिवासी के भी हैं तो सुरक्षाबल के उस जवान और उसके परिजनों के भी हैं जो अपना सब कुछ छोड़कर वहां तैनात हैं।


इसके लिए आदिवासियों को अपनी जायज मांगों पर सरकार से बात करनी चाहिए लेकिन उसके लिए हिंसा करना अथवा हिंसा करने वालों का साथ लेना या देना कतई नहीं होना चाहिए। ऐसी सूरत में सुरक्षाबलों के हर कदम को जायज मानना चाहिए। और उन्हें उनके विरुद्ध किसी भी तरह की कार्रवाई न होने का संरक्षण भी मिलना चाहिए। सरकार जब तक उनका विश्वास हासिल करे, तब तक के लिए देश के ऐसे 3-5 लोगों की एक कमेटी बनाए जिसमें सब का भरोसा हो। आदिवासियों का खास तौर से। नक्सलियों का भी हो तो बुरा नहीं है। इस आयोग का बड़ा काम आदिवासी क्षेत्रों में आगे क्या काम हों और कैसे हों, तय करने का तो हो ही पर अब तक क्या काम हुए, आदिवासियों के नाम पर आया पैसा कहां गया, यह देखना भी हो। आदिवासियों से संवाद के लिए नए-पुराने ठेकेदारों के बजाए सीधे आदिवासी से बात की जाए। उनके बीच जाने की हिम्मत वाले लोग आगे लाए जाएं। जब तक आदिवासियों का शोषण नहीं रुकेगा, उन्हें शिक्षा नहीं मिलेगी, रोजगार की गारंटी नहीं मिलेगी, अंधाधुंध खनन के लिए बंदूक की नोंक पर उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल करना नहीं रुकेगा, नित नए सलवा-जुडूम खड़ा करना बंद नहीं होगा, आन्दोलनों पर सुनवाई के बजाय गोलियां बरसाई जाएंगी, उन तक पहुंचने वाले हथियार और पैसे को नहीं रोका जाएगा, जब तक गुप्तचर पुलिस चाक-चौबंद नहीं होगी, जब तक स्थानीय पुलिस दिल से अन्य केन्द्रीय बलों के साथ नहीं जुड़ेगी तब तक कुछ दिनों का युद्ध विराम भले हो जाए स्थाई शांति नहीं होने वाली। रणनीति मरने-मारने की नहीं आदिवासियों का विश्वास पाने की बननी चाहिए तभी नक्सली उनसे दूर होंगे और छत्तीसगढ़ में, लाल कॉरिडोर में अमन-चैन होगा। अन्यथा जमीनी हकीकत से अनजान दिल्ली और रायपुर रणनीतियां बनाते रहेंगे। नक्सलियों के नाम पर उनके नेता, विकास कार्यों के नाम पर ठेकेदार और कमीशन ले-लेकर राजनेता-अफसर मालामाल होते रहेंगे। जान जाएगी आदिवासी या फिर सुरक्षा बल के जवान की।


नक्सली प्रभावित क्षेत्रों की बात करते हुए एक प्रमुख तत्व को हर सरकार जानबूझकर सामने नहीं आने देती, वह है इन क्षेत्रों में चलने वाली खनन गतिविधियां। इन दुर्गम आदिवासी इलाकों में अरबों रुपए कीमत की प्राकृतिक संपदा लोहा व अन्य अयस्कों (ओर) के रूप में छुपी हुई है और देश की अनेक छोटी-बड़ी कंपनियां यहां खनन करने में जुटी हुई हैं। इन कंपनियों को कभी नक्सली हिंसा से नहीं जूझना पड़ता बल्कि हिंसा होते रहने से इन इलाकों में कानून का राज नहीं चलता। अगर मनमाने तरीके से खनन हो तो भी कोई रोकने वाला नहीं है। इस तथ्य की गहराई और ईमानदारी से जांच की जाए तो कुछ ऐसे पहलू सामने आ सकता थे हैं जो निश्चित ही देश की जनता की आंखें खोल देंगे।

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