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विधायिका को चर्चा का कितना हक?

Patrika news network Posted: 2017-03-20 10:31:07 IST Updated: 2017-03-20 10:31:07 IST
विधायिका को चर्चा का कितना हक?
  • जनता को यह जानने का हक है कि मामला कोर्ट में लंबित क्यों है और फिलहाल किस स्तर पर है? साथ ही सुनवाई में क्या हुआ? ये जानकारियां सार्वजनिक करने पर रोक नहीं है।

जस्टिस सुनील अम्बवानी

(पूर्व मुख्य न्यायाधीश) 

लैटिन भाषा के शब्द  'सब ज्यूडिस' का अर्थ है किसी न्यायाधीश या न्याय के अधीन। आम तौर पर ऐसा मामला जो अदालत के समक्ष विचारार्थ पेश किया जाए या विधि द्वारा स्थापित न्यायालय में फैसले के लिए लाया जाए तो उक्त मामले के अदालत में लंबित रहने तक उसे 'सब ज्यूडिस' माना जाता है। ऐसे किसी भी मामले में सार्वजनिक बहस पर प्रतिबंध होता है। 



अपवाद के तौर पर यदि मीडिया केवल लोगों को जानकारी देने के लिए इस मामले पर खबर या रिपोर्ट दे सकता है। कोर्ट में विचाराधीन मामलों पर इस तरह का प्रतिबंध का मकसद यह है कि ऐसा कोई भी विचार-विमर्श मामले से जुड़े न्यायाधीश को मुश्किल में डाल सकता है। 



खास तौर पर तब, जब यह विचार-विमर्श निष्पक्ष न हो और उन तथ्यों व साक्ष्यों से परे हो जो कि कोर्ट में पेश किए हैं। अपवाद स्वरूप जनता की जानकारी और आपसी विचार-विमर्श के लिए मामले के तथ्य और उस पर सुनवाई के दिन हुई अदालती कार्रवाई के तथ्यों को जरूर प्रकाशित कर सकते हैं। 



जनता को यह जानने का हक है कि मामला कोर्ट में लंबित क्यों है और फिलहाल किस स्तर पर है? साथ ही सुनवाई में क्या हुआ? ये जानकारियां सार्वजनिक करने पर रोक नहीं है। हां, यदि मामले से संबंधित जज ही इस पर रोक लगाए तब बात अलग है। अदालत में लंबित मामले पर अनुचित व सौद्देश्य विचार-विमर्श कोर्ट की अवमानना का मामला बन सकता है।



द्वेषपूर्ण इरादों के चलते ऐसी सामग्री प्रकाशित करने वाले प्रकाशक के खिलाफ अवमानना का मामला दर्ज हो सकता है। विचाराधीन मामले पर सार्वजनिक विचार-विमर्श या ऐसी सामग्री का प्रकाशन जिससे अदालती कार्रवाई के नतीजे को प्रभावित किया जा सके या किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचे तो कोर्ट या कोई भी संबंधित व्यक्ति प्रकाशक के खिलाफ अवमानना मामला दर्ज कर सकता है। 



हालांकि, संसद या विधानसभा में ऐसे किसी मामले पर विचार-विमर्श किया जाता है तो वह इस श्रेणी में नहीं आता। ऐसा इसलिए कि सदन के सदस्यों को विशेषाधिकार प्राप्त है, इसका लाभ उठा वे जनचिंताओं की भी परवाह नहीं करते। संविधान के अनुच्छेद 105 में सांसदों को ये अधिकार हैं। 



अनुच्छेद 105 के उप प्रावधान (2) के अनुसार, यदि कोई सांसद कोर्ट में विचाराधीन मामलों पर संसदीय कार्यवाही के दौरान कुछ कहता है या उसके पक्ष अथवा विपक्ष में वोट करता है तो वह उसके लिए जवाबदेह नहीं है और ना ही कोई भी व्यक्ति संसद के किसी भी सदन द्वारा ऐसे किसी भी वोट या कार्यवाही पर कोई भी रिपोर्ट या पत्र प्रकाशित करने के लिए जवाबदेह होगा। 



संविधान का अनुच्छेद 194 में विधानसभा सदस्यों को ऐसे ही हक देता है। उप प्रावधान (2) के तहत भी विधायकों को सांसदों जैसे ही अधिकार और विशेषाधिकार हैं, जैसे कि सांसदों को अनुच्छेद 105 के प्रावधान 2 के तहत मिले हैं। 



जहां तक मुझे जानकारी है, ना तो संसद और ना ही राजस्थान विधानसभा ने सांसदों या विधायकों द्वारा कोर्ट में लंबित मामलों पर बहस या टिप्पणी के संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 105 के उप प्रावधान (3) या अनुच्छेद 194 के उप प्रावधान (3) के तहत कोई कानून लागू नहीं किया है। कोर्ट में लंबित मामलों के तथ्यों पर संसद या विधानसभा में चर्चा हो पर चर्चा में निम्न पर प्रतिबंध होने चाहिए-

-अदालत में पेश किए गए गोपनीय दस्तावेज से ली गई सूचनाओं के खुलासे पर। -अदालती कार्रवाई को प्रभावित करने के लिए किसी भी तरह के अभियान पर। -ऐसी चर्चा जिसमें कार्यवाही की रिपोर्टिंग पर बहस के दौरान अदालती आदेश की अवहेलना हो। -अदालती कार्यवाही का अनुमान न लगाना। कोर्ट में लंबित केस की सुनवाई से जुड़े बाल अभियुक्तों, गवाहों या यौन प्रताडऩा के पीडि़तों की पहचान उजागर करने पर। -न्यायिक प्रशासन की निंदा या उसके कामकाज में बाधा डालने संबंधी आक्षेप पर। न्यायाधीशों के चरित्र, क्षमता, आचरण या व्यक्तित्व पर चर्चा।



सांसद और विधायक जनता से जुड़े मामले के तथ्यों पर अपने निर्वाचन क्षेत्र या राज्य में चर्चा क। हुई किसी तरह की टिप्पणी को कार्यवाही में शामिल न करे, जो उक्त बिंदुओं में प्रतिबंधित हैं। ऐसा ही एक मामला केशव सिंह का है। इसमें यूपी विधानसभा की अवमानना में एक पत्रकार की गिरफ्तारी की मांग की गई थी। गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने रोक लगा दी थी। इस पर विधानसभाध्यक्ष ने जजों को नोटिस जारी किए। 



परिणामस्वरूप संपूर्ण अदालत की पीठ ने स्पीकर के आदेश पर रोक लगा दी थी। राष्ट्रपति संबंधी संदर्भ (1964 के विशेष संदर्भ संख्या 1) के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एआईआर 1965 एससी 745 के तहत विधानसभा के अधिकार तय कर हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। जहां तक मुझे ज्ञात है अभी तक कोर्ट में लंबित मामलों पर सदन में चर्चा के दौरान नियमों की सीमा के उल्लंधन को लेकर कोर्ट ने विधानसभा सदस्यों के खिलाफ  ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया है। 




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