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गीता का दैनिक जीवन के साथ सम्बन्ध

Patrika news network Posted: 2015-03-01 07:01:12 IST Updated: 2015-03-01 07:09:17 IST
गीता का दैनिक जीवन के साथ सम्बन्ध
  • मानव स्वभाव का वर्णन और उसे जानने के लिए हमेशा लोगों में रूचि रहती है। स्वभाव निर्णय भारतीय ऋषियों ने किया है। अपौरुषेय वेदों में ही मानव स्वभाव सम्बन्धी सूक्ष्म तत्त्व मिलते हैं। 

लेखक : डॉ. श्रीपाद जोशी

मानव स्वभाव का वर्णन और उसे जानने के लिए हमेशा लोगों में रूचि रहती है। स्वभाव निर्णय भारतीय ऋषियों ने किया है। अपौरुषेय वेदों में ही मानव स्वभाव सम्बन्धी सूक्ष्म तत्त्व मिलते हैं। 

मन के बारे में चिन्तन करने वाले आधुनिक मनोविज्ञानियों का इतिहास मुश्किल से 300 साल का ही है। वे इन्द्रिय मन तक अपने विचारों को सीमित रखे हुए हैं। कारण यह है कि अदृश्य और काल्पनिक तत्त्वों का चिन्तन न तो सम्भव है और न ही हो सकता है। 

दूसरी ओर हमारी भारतीय परम्परा में तो ऋषि मन से ऊपर चलकर जीवात्मा और परमात्मा की अवधारणा तक पहुंच चुके थे। हमारे ऋषियों का चिन्तन इस स्वभाव वर्णन विज्ञान करने वाले मनोविज्ञान की चरम सीमा तक पहुंच चुका था, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है। 

परम्परा में धर्म शब्द नित्य जीवन में आचरण के अर्थ में था। धर्म प्रधान था। धर्म और संस्कृति, धर्म और आध्यात्मिकता, धर्म और व्यवहार इस प्रकार हमारे जीवन में ही नहीं बल्कि प्रकृति में भी ओत-प्रोत रहता था। इस धर्म से हमारे जीवन को अलग नहीं किया जा सकता। 

इस व्यवहार की प्रधानता को देखकर ही 'आचार: परमो धर्म:Ó कहा गया है। आचार्य भी वही है जो आचरण सिखाता है अर्थात् धर्म मार्ग पर शिष्य को अटल रहने और अक्षुण्ण चलने का मार्ग दिखाता है। ये सभी आचार्य हमारी परम्परा में अघोषित मनोविज्ञानी ही थे। इसलिए छान्दोग्य बताता है कि 'आचार्यवान् पुरुषो वेद, आचार्याद्धैव विदिता विद्या साधिष्ठं प्रापत्।Ó मानव मात्र में दिखाई देने वाले गुणों को प्रकाश में लाना और दुर्गुणों को अपने आप अनुभव कराने वाला था भारतीय मनोविज्ञान। और यही नहीं साक्षात् वेदों में विशेषत: उपनिषदों में भी यही कहा गया है। 

वेदों को सकल ज्ञान की राशि मानकर कई विद्वान् अद्भुत विषयों को प्रकाश में लाए हैं। इनमें कुछ भले ही प्रयोग से प्रमाणित नहीं हुए हों, ऐसे विषयों की उपेक्षा न करके आगे सोचना हमारा कर्तव्य होगा। श्रीमद्भगवद्गीता को लेकर प्राच्य और पाश्चात्य विद्वानों के द्वारा कई ऐसे रहस्यों को प्रकाश में लाया गया। यह कहने में किसी को भी संकोच नहीं होगा कि उन समस्त कृतियों में यह ग्रन्थ अद्वितीय और अनुपम है। 

इस ग्रन्थ में शास्त्रों में कहे गए तीन गुणों को आधार मानकर विश्लेषण किया गया है। यह विश्लेषण अन्य विश्लेषण की तरह नहीं है, यह प्रामाणिक और गहन अध्ययन का फलस्वरूप है। नव अध्यायों से युक्त यह ग्रन्थ, शुरू में ही धर्म के आधार कर्म को लेकर तर्क संगत विचार कर प्रतिपादन करता है कि मानव जीवन की आधारशिला कर्म ही है। 

यहां सर्व प्रसिद्ध गीता वाक्य 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनÓ का प्रतिपादन उल्लेखनीय है। हालांकि भगवान् का कहना है कि तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि कर्म करो और उस कर्म से मिले फल का उपभोग भी करो, परन्तु यह मत सोचो इस फल पर मेरा भी अधिकार है। अन्यथा कोई भी मनुष्य कर्म पर विश्वास नहीं करेगा। 

हर अध्याय में इस प्रकार नए विषयों को बल्कि गीता रहस्य को खोलना इस ग्रन्थ की विशिष्टता है। विशेषत: पांचवें अध्याय में वेद सार प्रस्तुत किया है। यहां पर अधिक वेद वाक्यों का उल्लेख नहीं करते हुए भी पाठकों को सचेतन हिरण्यगर्भ तक पहुंचाना लेखक की विशेषता है। 

इस ग्रन्थ के प्राणभूत नौवें अध्याय में लेखक गीता के रूप में ही परिणत हुए हैं ऐसा लगता है। गीता का दैनिक जीवन से जो सम्बन्ध है उसके निरूपण में लेखक सफल हुए हैं। 

इस व्यवहारोपयोगी ग्रन्थ के लेखक हंै-डॉ. श्रीपाद जोशी। इन्होंने अर्थशास्त्र का अध्यापन करते हुए अपने चिन्तन की धारा से प्रेरित होकर अर्थशास्त्र पर भारतीय चिन्तन का प्रभाव, उदारीकरण की अर्थिक प्रक्रिया में गांधीय चिन्तन आदि कई ग्रन्थों के लेखन के बाद गीता अनुसन्धान प्रारम्भ किया। बीज प्राणायाम के साधक डॉ. जोशी इस प्रकार अपनी सारस्वत साधना के फल को जन मानस तक पहुंचाते रहें।

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