Ad Block is Banned Click here to refresh the page

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे

पढ़िए नरेंद्र कोहली द्वारा रचित महासमर, भाग-9

Patrika news network Posted: 2017-02-13 11:44:35 IST Updated: 2017-02-13 12:02:42 IST
  • देवव्रत के मन में जैसे बहुत कुछ उलझ गया, और साथ ही बहुत कुछ सुलझ भी गया...तो इसलिए इतने वर्षों के पश्चात अचानक पिता को याद आया है कि देवव्रत उनका एकमात्र पुत्र है।

देवव्रत किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े रह गए... उनके हाथ में क्या था? ...आखिर मंत्री क्या कहना चाहते हैं....पुन: मंत्री ही बोले, ‘युवराज! महाराज काम-ज्वर से पीड़ित हैं। इसलिए राजवैद्य उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते।’



देवव्रत के मन में जैसे बहुत कुछ उलझ गया, और साथ ही बहुत कुछ सुलझ भी गया...तो इसलिए इतने वर्षों के पश्चात अचानक पिता को याद आया है कि देवव्रत उनका एकमात्र पुत्र है। इस लम्बी अवधि में पिता न तो काम से विरक्त हुए थे, न उसका शमन कर पाये थे। उन्हें केवल कोई उपयुक्त पात्र नहीं मिला था...



मां को देखकर भी पिता की यही अवस्था हुई होगी। तभी तो उन्होंने उनका परिचय तक पाने की आवश्यकता नहीं समझी और उनकी प्रत्येक शर्त स्वीकार की। पिता को जब काम-ज्वर होता है तो उसके ताप से सबसे पहले उनके विवेक को पक्षाघात हो जाता है।...कौन है वह स्त्री, जिसने पिता की धमनियों में इतने वर्षों से सोये ज्वार को फिर से जगा दिया है?...

‘पर पिताजी ने इस विषय में मुझसे तो कुछ नहीं कहा....।’



‘वयस्क पुत्र के सम्मुख अपने नये विवाह की इच्छा कौन पिता प्रकट कर सकता है, राजकुमार?’ मंत्री का स्वर अब भी गम्भीर था, ‘यही तो चक्रवर्ती का द्वन्द्व है....।’

‘क्या?’

‘वे इस कन्या के बिना जी नहीं सकेंगे, और उससे विवाह वे कर नहीं पाएंगे।’

‘विवाह क्यों नहीं कर पाएंगे?’ देवव्रत सहज भाव से कह गए, ‘क्या केवल इसलिए कि उनका एक वयस्क पुत्र भी है। पहले भी तो प्रौढ़ राजाओं ने नए विवाह किए हैं।’



‘किए हैं।’ मंत्री बोले, ‘पर उसके लिए किसी न किसी को मूल्य भी चुकाना ही पड़ा है। ययाति ने फिर से युवावस्था की कामना की थी तो पुरु को वृद्धावस्था अंगीकार करनी पड़ी थी।’

देवव्रत ने ध्यान से मंत्री को देखा। वे मंत्री के चेहरे से वह सब कुछ पढ़ लेने का प्रयत्न कर रहे थे, जो मंत्री की वाणी ने नहीं कहा था।

‘क्या बात है अमात्य?’



‘युवराज!’ मंत्री बोले, ‘यमुना के तट पर दासराज नामक केवट प्रमुख का स्थान है। उसकी पुत्री अत्यन्त रू पवती है। चक्रवर्ती ने पुत्री को देखते ही उसके पिता के सम्मुख पाणिग्रहण का प्रस्ताव रखा था, किन्तु दासराज की शर्त को सुनकर चुपचाप लौट आये।’

‘ऐसी क्या शर्त है अमात्य?’



‘ऐसे अवसरों पर एक ही शर्त होती है युवराज!’ मंत्री बोले, ‘नई रानी के पुत्र को राज्याधिकार और पहले पुत्र का अधिकारच्युत होना। ...इसीलिए मैंने कहा था युवराज! कि अब सब कुछ आपके ही वश में है...।’

देवव्रत समझ नहीं पाये कि वे क्या कहें... क्या मंत्री उनके सामने यह प्रस्ताव रख रहे हैं कि वे अपने अधिकारों से उदासीन हो जाएं? जो बात पिता अपने मुख से नहीं कह सके, क्या उसे ही वे मंत्री के माध्यम से कहलवा रहे हैं?... क्या पिता की यही इच्छा है?.... पर यदि पिता की यह इच्छा हो भी तो यह एक कामासक्त व्यक्ति की इच्छा है। आसक्ति की स्थिति में विवेक स्थिर नहीं रहता। और इस समय तो पिता भी समझ रहे हैं कि यह मांग उचित नहीं है।... वे जानते हैं कि यह उचित नहीं है, इसलिए देवव्रत से कुछ कह नहीं सके, पर उनकी इच्छा है कि यह ‘अनुचित’ भी किसी प्रकार सम्भव हो जाए, तभी तो उन्होंने दूसरे पुत्र की इच्छा व्यक्त की थी। तभी तो मंत्री ने उनके सामने प्रकारान्तर से यह प्रस्ताव रखा....।



देवव्रत के मन में जैसे घृणा का उत्स फूट आया: यह है पिता का रू प। वात्सल्यमूर्ति जनक और पिता। कामासक्ति का वेग इतना अबूझ और प्रहारक है कि पिता, पुत्र से इस प्रकार झूठ बोलता है। पिता यह नहीं कह सके कि अपनी पहली पत्नी से अलग होकर, संयम का जो कामरहित जीवन उन्होंने बिताया, वह मात्र एक प्रतिक्रिया थी।... पुरुष की समस्त आसक्ति नारी में है और जिस दिन वह नारी उसे छोड़ जाती है, उस दिन यह सारी सृष्टि उसके लिए माया का प्रपंच हो जाती है।



... और जिस दिन फिर कोई नारी उसके सम्मुख आ खड़ी होती है, उस दिन फिर से सृष्टि मोहिनी रू प धारण करके हंसने लगती है।... पिता ने अपने पिछले अनुभव से कुछ नहीं सीखा। उन्होंने नहीं देखा कि यह आकर्षण प्रेम नहीं है, यह विवेक की हत्या है, यह मोहासक्ति का जाल है। मां ने भी इसी आसक्ति के मूल्य के रू प में पिता को अपनी इच्छा का दास बनाया था। 



मां के जाने के बाद पिता ने यह नहीं सोचा कि उन्हें दासता से मुक्ति मिल गई है, वे पुन: नई स्वामिनी की खोज में निकल पड़े। अब उन्हें मिली है दासराज की कन्या, जो अपने मूल्य के रूप में पिता से उनकी अगली पीढ़ी की भी दासता मांग रही है.... ययाति ने पुरु से उसका यौवन मांगा था तो स्पष्ट कहा था कि अभी यौवन के भोगों से उनकी तृप्ति नहीं हुई है, इसलिए यदि पुरु उन्हें अपना यौवन दे दे तो वे उसे अपना राज्य दे देंगे... और चक्रवर्ती शान्तनु अपने पुत्र से कह रहे हैं कि वे दूसरा पुत्र पाना चाहते हैं। वे उनसे उनका पैतृक अधिकार छीनना चाहते हैं, वह भी पुत्र-प्रेम के नाम पर... वे क्या करें, ऐसे पिता के लिए?




rajasthanpatrika.com

Bollywood