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Video: पढ़िए नरेंद्र कोहली द्वारा रचित महासमर, भाग-11

Patrika news network Posted: 2017-02-15 12:32:21 IST Updated: 2017-02-15 12:32:21 IST
  • वे उस युवती को नहीं जानते, न वह युवती उन्हें जानती है, फिर उसके विरुद्ध मन में प्रतिहिंसा का भाव पालने का क्या अर्थ?... सावधान देवव्रत! जो अपने मन में होता है, वही सारे संसार में भासित होने लगता है।

पर यहां कौन अपहरण कर रहा है?... अपहरण ही तो है। सेना लेकर आक्रमण न किया, एक वचन की आड़ में उनका राज्य छीन लिया। यह शत्रुता ही तो है... देवव्रत को लगा, उनके मन में उस अज्ञात युवती और उसके पिता दासराज के विरुद्ध आक्रोश संचित हो रहा है, वे अजाने ही उन्हें अपना शत्रु मानने लगे हैं।... पर तुरन्त ही वे सावधान हो गए।... वे उस युवती को नहीं जानते, न वह युवती उन्हें जानती है, फिर उसके विरुद्ध मन में प्रतिहिंसा का भाव पालने का क्या अर्थ?... सावधान देवव्रत! जो अपने मन में होता है, वही सारे संसार में भासित होने लगता है। 



यदि वे अपने मन में प्रतिहिंसा पालेंगे तो उन्हें सब ओर अपने विरुद्ध हिंसा ही होती दिखाई देगी... उस युवती का उनसे क्या विरोध! वह तो चक्रवर्ती से एक अनुचित मांग की पूर्ति का मूल्य मांग रही है। राजाओं के इस प्रकार के अनमेल विवाहों के पहले अपने दौहित्र के लिए राज्याकांक्षा तो प्रत्येक कन्या का पिता करता ही है। 



केकयराज ने भी कैकेयी के कन्यादान से पूर्व चक्रवर्ती दशरथ के सम्मुख यही शर्त रखी थी... पर राम ने न कभी भरत को अपना विरोधी समझा, न भरत के नाना को...



पर अधिकार की रक्षा की बात?... देवव्रत  को लगा, अब अधिकार पर उनका अधिक बल नहीं है। समाज, देश और राष्ट्र अपने अधिकारों के लिए लड़ें; पर देवव्रत अपना राज्याधिकार छोड़ सकते हैं। वे उस राज्याधिकार के लिए अपने कुल में कलह क्यों करें, जो किसी को सुखी नहीं बना सका। 



देवव्रत तो सुख को खोज रहे हैं, राज्य को नहीं।... शायद वे राज्य को छोडक़र ही अधिक सुखी हो सकें। पिता को दासराज की पुत्री प्राप्त होगी- दासराज को अपने दौहित्र के लिए राज्य मिलेगा। दोनों सुखी होंगे... देवव्रत  के मन में राज्य की कोई कामना नहीं है...



किन्तु तत्काल ही जैसे देवव्रत का मन बदल गया।... क्या सोच रहे हैं वे? वे पिता को सुखी करना चाह रहे हैं; दासराज, उसकी पुत्री और उसके दौहित्र को सुखी करना चाह रहे हैं... पर सुख है क्या? एक वृद्ध की एक युवती के लिए विवेकशून्य आसक्ति किसे सुख देगी? 



उनका दाम्पत्य जीवन, पिता को कितना काम-सुख देगा और कितनी काम-यातना? पिता के मन में उस कन्या के लिए आसक्त उनका प्रेम नहीं है। सुख यदि कहीं मिलता है तो केवल प्रेम में मिलता है। प्रेम भी वह, जिसमें प्रतिदान की कामना ही न हो, केवल दान ही दान हो। पिता, इस प्रकार के प्रेम से परिचित ही नहीं है। वे पुन: काम-यातना में तड़पने की व्यवस्था कर रहे हैं।... और वह कन्या! क्या सुख पाएगी वह! 



केवट की कन्या, राजप्रासाद में आएगी तो अपनी हीन-भावना से ही मर जाएगी। मरेगी नहीं तो दूसरों को मारने का प्रबन्ध करेगी। लोगों की दृष्टि और वाणी उसका परिहास करेगी और वह अपनी प्रतिहिंसा का बल निर्बलों पर प्रकट करेगी। उसके सामने सबसे निर्बल होंगे राजा शान्तनु। वह स्वयं भी पीड़ा पाएगी और उन्हें भी पीडि़त करेगी।... चक्रवर्ती का विवेक इस समय संज्ञा-शून्य है, अचेत है। 



वे नहीं जानते कि उनका सुख किस बात में है। अबोध बालक या उन्मादी व्यक्ति की इच्छाएं तो पूरी नहीं की जा सकतीं। यह तो उनके हित में नहीं है... और दासराज-कन्या तो मात्र प्रतिशोध ले रही है। उसे इसमें क्या सुख मिलेगा?... यदि देवव्रत सचमुच अपने पिता को सुखी देखना चाहते हैं तो उन्हें पिता को इस कन्या के मोह-जाल से मुक्त करना होगा। 



वह कन्या तो उनकी यातना है। बालक अग्नि को पकडऩा चाहे तो उसकी इच्छा पूरी नहीं होने देनी चाहिए। और इस समय देवव्रत ही पिता को इस भावी आपत्ति से मुक्त रख सकते हैं... वे चाहें तो अपना राज्याधिकार त्यागना अस्वीकार कर दें... पिता, न उस कन्या को पा सकेंगे, न काम-यातना भोगेंगे।

किन्तु तभी उनके मन में एक भयंकर काली मूर्ति ठठाकर हंस पड़ी। ‘‘कौन है तू?’’ देवव्रत ने पूछा।



‘‘मुझे नहीं पहचाना?’’ काली मूर्ति हंसी, ‘‘मैं तेरे मन का कलुष हूं। बहुत चतुर समझता है तू अपने-आपको। समझता है कि कुतर्कों और अतर्कों से तू पिता को पराजित कर देगा और जीवन का सुख-भोग करेगा। राज्याधिकार तू नहीं छोड़ेगा और वंश-वृद्धि के नाम पर अपना विवाह करेगा। स्पष्ट क्यों स्वीकार नहीं करता कि तुझे राज्य भी चाहिए और स्त्री-सुख भी...।



‘‘हे भगवान्!‘‘ देवव्रत ने अपना सिर पकड़ लिया, ‘‘मैं क्या सोच रहा हूं।’’ उन्होंने अपना सिर उठाकर आकाश की ओर देखा, ‘‘क्या इच्छा है तेरी?’’



प्रात: बहुत जल्दी हस्तिनापुर का नगर-द्वार खुल गया और अश्वारोही सैनिकों के अनेक गुल्म द्वार से बाहर निकलकर मार्ग के दोनों ओर प्रयाण की आज्ञा की प्रतीक्षा में खड़े हो गए। सैनिक यद्यपि सशस्त्र थे, फिर भी वे युद्ध-वेश में न होकर मांगलिक वेश में थे, जैसे किसी समारोह के लिए तैयार हुए हों। अश्वारोहियों के पश्चात् रथों की बारी आई। सबसे आगे वाले रथ पर युवराज देवव्रत विराजमान थे। 



दूसरा रथ सेनापति का था और तीसरा मन्त्री का। चौथा रथ सबसे बड़ा, सुविधासम्पन्न और अलंकृत था। किन्तु यह रथ खाली था। उसमें दो दासियां अवश्य थीं; किन्तु स्पष्टत: यह रथ दासियों की सवारी के लिए नहीं था। 




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