महासमर, भाग-10: नए स्वरूप में पढ़िए महाभारत की महागाथा

Patrika news network Posted: 2017-02-14 11:18:37 IST Updated: 2017-02-14 11:19:20 IST
  • इस प्रकार राज्य का अपहरण कर जो व्यक्ति कल हस्तिनापुर के राज-सिंहासन पर बैठेगा, वह समाज के अधिकारों की क्या चिन्ता करेगा.... वह प्रजा के साथ क्या न्याय करेगा?

लौटते हुए देवव्रत का मस्तक द्वन्द्वों के मारे झनझना रहा था...किस द्विविधा में झोंक दिया पिता तुमने? देवव्रत भी जैसे एक देवव्रत न रहकर अनेक हो गए हैं। एक मन कुछ कहता है, दूसरा कुछ और।... पिता कामासक्त हो रहे हैं तो हों। विवाह करना चाहते हैं, करें। 



राज्य किसी और को देना चाहते हैं, दें। देवव्रत को कोई आपत्ति नहीं है। देवव्रत किसी की इच्छा के मार्ग में विघ्न-स्वरू प नहीं आना चाहते। देवव्रत को किसी का राज्य नहीं चाहिए।... पर अधिकार की बात देवव्रत के मन में अधिक खटकती है। पौरव-वंश का यह राज्य, देवव्रत का अधिकार है। 



वे इसके न्यायसिद्ध युवराज हैं। प्रजा उन्हें चाहती है।... यदि देवव्रत से उनकी कोई निजी वस्तु मांगी जाती तो दान करने में उन्हें रंचमात्र भी कष्ट नहीं होता। किसी दीन-हीन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए त्याग करने में कोई बुराई नहीं है....किन्तु किसी की अनुचित-असामयिक इच्छा के लिए अपना न्यायोचित अधिकार छोडऩा धर्म-संगत है क्या?



... जब मां ने एक-एक कर सात पुत्रों को जीवन-मुक्ति दी थी, तो पिता अपनी कामासक्ति के कारण अपने और  अपनी सन्तानों के अधिकार के विषय में कुछ नहीं कह सके थे।... आज फिर वे अपनी उसी कामासक्ति के कारण देवव्रत के धर्म-संगत न्यायोचित अधिकार की बात नहीं सोच पा रहे हैं।...ठीक है कि उन्होंने देवव्रत को अपना अधिकार त्यागने के लिए नहीं कहा है। 




वे चाहें तो उन्हें पद्च्युत भी कर सकते हैं, वह भी उन्होंने नहीं किया है...किन्तु अपने पलंग पर औंधे मुंह लेट, हाथ-पैर पटक-पटक कर अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करते हुए, क्या वे अपने पुत्र को अप्रत्यक्ष रू प से बाध्य नहीं कर रहे कि वह अपना शासनाधिकार त्याग दे...आज यदि देवव्रत अपना अधिकार नहीं छोड़ते तो आने वाली प्रत्येक पीढ़ी उन्हें पितृ-द्रोही के रू प में धिक्कारेगी कि वे अपने पिता के सुख के लिए राज-सुख नहीं त्याग सके... राज-सुख ....देवव्रत का मन इस शब्द पर अटक गया... क्या होता है राज-सुख? 



पिता चक्रवर्ती सम्राट हैं। राज्य में उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई एक तिनका नहीं तोड़ सकता... पर क्या वे सुखी हैं? चक्रवर्ती सम्राट एक सामान्य युवती का अनुग्रह पाने के लिए हाथ-पैर पटक रहा है।



...कहां है राज-सुख? यदि राज्य से ही कोई सुखी हुआ होता... और जिस सुख के लिए आज वे इतने आतुर हो रहे हैं... वह भी कोई सुख है क्या? ऐसा ही सुख पाने के लिए पिता पहले भी तड़पे होंगे।.... पर कोई सुख मिला? पिछले अनेक वर्षों से उस सुख से वंचित होकर तड़पते हुए तो उन्हें देवव्रत देख रहे हैं... कैसी बुद्धि पायी है मनुष्य ने...देवव्रत की आंखों के सामने प्रात:काल का दृश्य घूम गया...



गोशाला में उनकी सबसे प्रिय गाय है- कपिला। एकदम निष्कलंक रंग, जैसे दूध की ही बनी हुई हो। इसी से देवव्रत ने उसका नाम कपिला रख छोड़ा है। बछड़ा भी उसका वैसा ही हुआ है- जैसे कपिला का बछड़ा न हो, कपास का गोलक हो। देवव्रत ने उसका नामकरण किया है- धवल। उनका ग्वाला सूरज उसे ‘धौला’ कहता है।



सुबह दूध दुहने के लिए जब सूरज धवल की रस्सी खोलने लगता है तो मां के पास जाने की उतावली में धवल भयंकर उछल-कूद मचाता है। इतनी उछल-कूद कि कभी-कभी सूरज के लिए रस्सी खोलना असम्भव हो जाता है। 



उसी खींचतान में निमिष मात्र के काम में कई पल लग जाते हैं।.... और देवव्रत के मन में हर बार आता है- कैसा नासमझ है धवल। सूरज उसी की इच्छा पूरी कर रहा है, और अपनी उतावली में धवल अपनी ही इच्छा के मार्ग में विघ्न उपस्थित कर रहा है।... मनुष्य भी अपनी आकांक्षा की तीव्रता में भूल जाता है कि उसका हित किसमें है। 



वह नहीं जानता कि जिस इच्छा की पूर्ति के लिए वह सिर झुकाये वनैले सूअर के समान दौड़ लगा रहा है, उस इच्छा की पूर्ति उसे कितना सुख देगी और कितना दुख... यदि शान्तनु यह कुरु साम्राज्य पाकर भी सुखी नहीं हैं तो देवव्रत को ही इस राज्य से क्या मिल जाएगा.... नहीं चाहिए देवव्रत को यह राज्य। पिता जिसे चाहें, दे दें। इस छोटे-से राज्य के लिए देवव्रत पितृ-द्रोही नहीं कहलाएंगे.....



पर देवव्रत को लगा, उनके अपने मन के ही किसी और कोने में से कोई दूसरा ही स्वर उठ रहा है।.... ठीक है, देवव्रत को राज्य का मोह नहीं है। वे बिना राज्य के भी सन्तुष्ट रह सकते हैं। वे अपनी इच्छा से अपना अधिकार छोड़ सकते हैं। 



व्यक्ति रूप में उनके इस त्याग को शायद सराहा भी जाएगा... किन्तु व्यक्ति का आदर्श समाज के आदर्शों से भिन्न होगा क्या? व्यक्ति देवव्रत त्याग करे, पर समाज के सामने भी वे यही आदर्श रखेंगे क्या?... अपने अधिकारों के लिए लडऩा समाज का धर्म है, या अपने अधिकारों को त्यागना?.... हस्तिनापुर का राज्य पिता की कोई ऐसी निजी सम्पत्ति तो है नहीं कि वे इसे जब, जिसे चाहें दे दें, और किसी को उससे कोई अन्तर न पड़े। 



इस प्रकार राज्य का अपहरण कर जो व्यक्ति कल हस्तिनापुर के राज-सिंहासन पर बैठेगा, वह समाज के अधिकारों की क्या चिन्ता करेगा.... वह प्रजा के साथ क्या न्याय करेगा?... और सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि देवव्रत का क्षात्र-धर्म क्या कहता है? यदि कोई उनके राज्य का अपहरण करना चाहे तो वे अपना अधिकार छोड़ देंगे क्या? 



इस प्रकार कहीं समाज, देश और राष्ट्र चलते हैं? संन्यासियों की त्याग-वृत्ति इस सृष्टि के क्रम को चलाये नहीं रख सकती। क्षात्र-धर्म तो समाज के पालन में है, अन्याय के प्रतिकार में है, अपहरणकर्ता का विरोध करने में है....(क्रमश:)




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