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ब्रह्म-विवर्त : क्या और क्यों

Patrika news network Posted: 2015-03-15 09:58:53 IST Updated: 2015-03-15 04:27:40 IST
ब्रह्म-विवर्त : क्या और क्यों
  • प्रस्तुत ग्रन्थ का शीर्षक ब्रह्म-विवर्त है। इसका अर्थ है कि एक ब्रह्म ही उस प्रकार संसार में परिणत हो जाता है जिस प्रकार एक ही समुद्र में अनेक लहरें उठती हैं।

प्रो. दयानन्द भार्गव

प्रस्तुत ग्रन्थ का शीर्षक ब्रह्म-विवर्त है। इसका अर्थ है कि एक ब्रह्म ही उस प्रकार संसार में परिणत हो जाता है जिस प्रकार एक ही समुद्र में अनेक लहरें उठती हैं। विवर्त का अर्थ लहर है। जिस प्रकार लहर का समुद्र से पृथक्  कोई अस्तित्व नहीं है, उसी प्रकार संसार का ब्रह्म से पृथक् कोई अस्तित्व नहीं है। जिस प्रकार लहर समुद्र से ही उत्पन्न होती है और समुद्र में ही स्थित रहती है तथा समुद्र में ही विलीन हो जाती है उसी प्रकार संसार ब्रह्म से ही उत्पन्न होता है, ब्रह्म में ही स्थित है और ब्रह्म में ही विलीन हो जाता है। इस स्थिति को शास्त्र में विवर्तवाद नाम दिया गया है।

पं.मधुसूदन ओझा रचित विज्ञान विद्युत् ग्रन्थ एक अत्यन्त स्पष्ट तथा सुगम ग्रन्थ है। इसमें ब्रह्मविद्या अथवा सृष्टि विचार का पद्धति पूर्वक विवेचन है। तथापि इसका प्रतिपाद्य इतना गूढ़ है कि उसकी एक विस्तृत व्याख्या चिर प्रतीक्षित थी। यह व्याख्या केवल ग्रन्थों को पढ़कर की जाती तो उसके प्रमाणित होने में सन्देह ही रहता क्योंकि इस विषय का स्पष्ट ज्ञान गुरुमुख से ही हो सकता है। इसीलिए हमारी परम्परा में गुरु का इतना महत्त्व है। 

हम 'बहुपठितÓ की अपेक्षा 'बहुश्रुतÓ को अधिक सम्मान देते हैं। बहुश्रुत गुलाब कोठारी ने अपने गुरु पण्डित देवीदत्त जी चतुर्वेदी के मुख से इस विषय का अध्ययन किया है। शैक्षणिक दृष्टि से तो उनके पास नियमित तथा मानद देशी-विदेशी 5 उपाधियां हैं ही। अत: उनके इस ब्रह्म-विवर्त नामक कर्पूर-भाष्य की प्रामाणिकता में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।

किन्तु प्रश्न है कि क्या किसी मत के श्रुति सम्मत हो जाने से ही उसे ठीक मान लिया जाना चाहिए? आस्तिक जनता तो ऐसा मानती है। किन्तु पिछले दो सौ वर्षों में विज्ञान नामक एक नया अनुशासन अस्तित्व में आया है जो आगम प्रमाण को न मानकर प्रत्यक्ष तथा अनुमान प्रमाण को ही मानता है। गुलाब कोठारी जी का मन है कि उनके इस भाष्य को पढ़कर वैज्ञानिक भी चर्चा के लिए आगे आएं। यदि ऐसा होता है तो वैदिक चिन्तन को एक नई दिशा मिलेगी।

जहां तक ब्रह्म-विवर्त भाष्य की विषय वस्तु के सम्बन्ध में कुछ कहने का प्रश्न है; पाठकोंको ब्रह्म-विवर्त का ही अध्ययन स्वयं करना होगा। उसका सारांश देना अथवा उस पर टीका-टिप्पणी करना ग्रन्थ के साथ न्याय नहीं होगा। इसके लिए तो किसी संङ्गोष्ठी में विभिन्न विद्वानों द्वारा कई शोध-निबन्ध प्रस्तुत किए जाना अपेक्षित है। यहां विषय प्रवेश के रूप में कतिपय बिन्दुओं का उल्लेख-मात्र किया जा रहा है-

ब्रह्म एक है। इस ब्रह्म के दो घटक हैं-रस तथा बल। ये दोनों सदा साथ-साथ रहते हैं। बलरहित रस की केवल कल्पना की जा सकती है। उसे निर्विशेष कहा गया है। रस में बल जब सुप्त अवस्था में रहता है तो उस अवस्था को परात्पर कहा गया है। इस परात्पर से सृष्टि नहीं होती क्योंकि यह असीम है और सृष्टि ससीम से ही होती है। जैसे ही सुप्त बल जागृत होता है ब्रह्म ससीम हो जाता है। उसे ही पुर कहा गया है। इस पुर में प्रविष्ट तत्त्व ही पुरुष कहलाता है। इस पुरुष के तीन रूप हैं। प्रथम रूप अव्यय है जिसमें कामना है। 

यही कामना मन का मूल है। द्वितीय पुरुष अक्षर है, जिसमें क्रिया रहती है और जो प्राण का मूल है। तृतीय पुरुष क्षर है जो अर्थ रूप है तथा जो वाक् का मूल है। यह मन, प्राण, वाक् की अथवा इच्छा, क्रिया और अर्थ की त्रयी ही साम, यजुष् और ऋक् तथा अव्यय, अक्षर और क्षर की त्रयी है। इस त्रयी का ही समस्त संसार विस्तार है। कैसे एक ब्रह्म त्रिविध रूपों में संसार को जन्म देता है-यही ब्रह्म-विवर्त का विषय है।

इस सारी प्रक्रिया को ग्रन्थ में इतने विशद रूप से व्याख्यायित किया गया है कि पढ़ते ही बनता है। तथापि विषय की गम्भीरता को देखते हुए इसे उपन्यास की भांति एक ही बैठक में एक ही बार पढ़ लिया जाए यह सम्भव नहीं। इसे कई बैठकों में कई बार पढऩा होगा जैसा कि सभी शास्त्रों के साथ होता है।

इतना निश्चित है कि जब भी जहां कहीं भी वेद की चर्चा होगी, इस ग्रन्थ का उल्लेख करते हुए इसमें प्रतिपादित विषयवस्तु का हवाला देना अपरिहार्य होगा। उसके बिना वेद की चर्चा पूरी नहीं मानी जाएगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी इस ग्रन्थ की प्रतिपाद्य वस्तु से सहमत हो जाएंगे। चिन्तन के क्षेत्र में ऐसा कभी भी नहीं होता। किन्तु इस ग्रन्थ की विषयवस्तु तथा प्रतिपादन शैली बेजोड़ है-ऐसा सभी निष्पक्ष समीक्षकों को मानना होगा। 

इतने मात्र में ही किसी ग्रन्थ की कृतकृत्यता हो जाती है। शेष सभी मतों का खण्डन करके अपने मत को ही सत्य सिद्ध करने की मध्य युगीन शैली अब कालातीत हो गई। सौभाग्य से प्रस्तुत ग्रन्थ इस दोष से सर्वथा मुक्त है। इसे पढऩा भी उसी मुक्त मन से चाहिए। 

यह मुक्त मन सबके पास है किन्तु आज के युवा वर्ग के पास विशेष रूप से स्वतन्त्र चिन्तन का गुण है। वैज्ञानिकों के साथ युवा वर्ग इस ग्रन्थ का अध्ययन अवश्य करे। परम्परागत पण्डित वर्ग तो इसे पढ़ेगा ही क्योंकि यह उनका मुख्य विषय है।

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