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ससुराल में सिखे हुनर से बेटियों ने बदली पीहर की तकदीर, पूरे गांव को दिया रोजगार

Patrika news network Posted: 2017-06-11 08:21:47 IST Updated: 2017-06-11 08:22:43 IST
ससुराल में सिखे हुनर से बेटियों ने बदली पीहर की तकदीर, पूरे गांव को दिया रोजगार
  • बेटियां किसी से कम नहीं होती। इसकी मिसाल है धूलेट का जूती उद्योग। इस उद्योग को यहां की बेटियों ने के कई कस्बों तक पहुंचा दिया।

विमल जैन. कनवास.

धूलेट की जूतियां पंजाब-हरियाणा में बजा रही डंका



बेटियां किसी से कम नहीं होती। इसकी मिसाल है धूलेट का जूती उद्योग। इस उद्योग को यहां की बेटियों ने के कई कस्बों तक पहुंचा दिया। यहां की जूतियां अब पंजाब और हरियाणा तक में अपना डंका बजा रही है। दरअसल दूसरे कस्बों  में ब्याही धूलेट की बेटियों ने ससुराल में बेरोजगारी को दूर करते हुए जूतियां बनाने का व्यवसाय शुरू किया। देखते-देखते अरण्डखेड़ा, मांगरोल, मण्डाना जैसे कस्बो में जूतियां बनाने का काम शुरू हो गया है।

 

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घर-घर में चल रहा उद्योग

धूलेट कस्बे के रेगर मौहल्ले में सौ से अधिक परिवार जूतियां बनाने का काम करते हैं। घरो में ही इन्होंने थोड़ी सी जगह निकाल इनके बैठने और जूतियां बनाने के काम ले रखी है। महिलाएं,पुरुष और बच्चे सभी अपनी अपनी सुविधानुसार काम करते हैं। महिलाएं जूतियां गांठने,बच्चे धागा पिरोने, आदि में सहयोग करते हैं।


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किसानो में अधिक है मांग 

देशी चमड़े से बनाई जाने के कारण व तले की मोटाई अधिक होने के कारण कृषि कार्यो में इन जूतियों की अधिक मांग है। धूलेट से जूतियां केकड़ी कस्बे में बेचीं जाती हैं।  वहां से व्यापारियों द्वारा पंजाब व हरियाणा तक इन्हें भेजा जाता है। 

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प्रदर्शनियों में भी लुभाया

धूलेट के जूती निर्माता कई बार अपनी जूतियों को सरकार द्वारा लगाई जाने वाली प्रदर्शनियों में लेकर गए हैं। इनमें जूतियों को सराहना भी मिली किन्तु सरकार द्वारा किसी भी प्रकार की आर्थिक व कौशल सहायता उपलब्ध नहीं करवाई गई।

दिन भर में दो सौ रूपए 

एक व्यक्ति दिनभर मेहनत करके मात्र एक जोड़ी जूती ही बना पाता है। यदि पत्नी व बच्चों को साथ लेकर काम करता है तो दो जोड़ी जूतियां बन पाती है। एक जोड़ी जूती में सौ रुपए की लागत आती है। थोक के भाव केकड़ी में दो सौ  रुपये बिकती है। दिनभर की मेहनत के बावजूद परिवार मात्र दो सौ रुपए ही कमा पाता है। 

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पीपाड़ से मंगवाते हैं चमड़ा

रेगर समाज के लोग मारवाड़ के कस्बे पीपाड़ से चमड़ा मंगवाते हैं। वहां के चमड़ा व्यापारियों को आर्डर देने पर वे यहां चमड़ा भेज देते हैं।आजकल कलात्मक जूतियों की मांग बढऩे पर रेगजीन की जूतियां भी बनाने लगी है। कारीगरों ने  कलात्मक सिलाई के लिए मशीने भी मंगवा ली हैं। 

बीमारियो ने किया घर 

लोगो द्वारा घर में चमड़ा और जूतियां रखने के कारण घरों में बदबू का गुबार उड़ता रहता है।  बरसात के समय सीलन के कारण जीना दुश्वार हो जाता है। इस कारण अधिकांश लोग बीमार रहते हैं । टीबी ने  मौहल्ले में  घर कर रखा है। स्वास्थ्य को लेकर कार्यशाला की आवश्यकता है। 

rajasthanpatrika.com

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