ये क्या कह गए विदेशी डॉक्टर, आस्ट्रेलिया से 25 साल पीछे हैं भारत

Patrika news network Posted: 2017-05-19 23:29:44 IST Updated: 2017-05-19 23:30:14 IST
ये क्या कह गए विदेशी डॉक्टर, आस्ट्रेलिया से 25 साल पीछे हैं भारत
  • आस्ट्रेलिया से कोटा आई डॉ. लीजा अमेटो ने भारतीय चिकित्सा तकनीक को 25 साल पुराना बता दिया। उन्होने कहा कि आस्ट्रेलिया में एनालॉग इंसुलिन का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन यहां अब भी इंसुलिन इंजेक्शन से दी जा रही है। आस्ट्रेलिया में आर्टिफिशियल पैनक्रियाज तैयार,लेकिन इनके भारत आने में सालों लग जाएंगे।

कोटा.

भारत में डायबिटिक बच्चों के लिए काफी सराहनीय काम हो रहा है और इसके बेहतरीन परिणाम भी सामने आ रहे हैं, लेकिन चिकित्सा तकनीक में 25 वर्ष पीछे है। आस्ट्रेलिया में डायबिटिक मरीजों के लिए एनालॉग इंसुलिन आ चुका है, जबकि यहां अब भी मरीज इंजेक्टेबल इंसुलिन ले रहे हैं। एनालॉग इंसुलिन की तकनीक भारत आने में काफी समय लग सकता है। यह कहना है आस्ट्रेलिया से आई पीडियाट्रिक एन्डोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. लीजा अमेटो का। 


डॉ. लीजा बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज की रोकथाम के लिए चलाए जा रहे लाइफ फॉर चाइल्ड प्रोजेक्ट के तहत दो दिन के लिए कोटा आई हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत भारत में 9 केंद्र संचालित हैं, जिनमें से एक केंद्र कोटा है।

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क्या है एनॉलोग इंसुलिन

भारत में अभी इंजेक्टेबल इंसुलिन का इस्तेमाल होता है। जिसे खाना खाने के करीब आधे घंटे लेना पड़ता है। इसमें व्यक्ति को समय का ध्यान रखना पड़ता है। कई बार इंसुलिन लेने के बाद व्यक्ति यदि खाना नहीं खा पाता तो इंसुलिन की वजह से शरीर में शुगर कम हो जाती है और उसकी जान पर बन आती है। जबकि एनालॉग इंसुलिन को आप जब खाना खाएं, उसी समय या खाने के बीच या बाद में ले सकते हैं। इसकी खासियत यह है कि शरीर में जाते ही तुरंत असर दिखाता है, लेकिन इसकी कीमत काफी है। इसके अलावा इंसुलिन स्प्रे व इनहेलर तक आ गए हैं।


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शुगर कंट्रोल करेगा आर्टिफिशियल पैंक्रियाज

डॉ. अमेटो ने बताया कि मौजूदा तकनीक में ग्लूकोज मीटर से ब्लड में शुगर की मात्रा का पता लगाने के बाद पंप से इंसुलिन दिया जाता है। ये दोनों अलग-अलग होते हैं। शोधकर्ताओं ने इसे जोड़ कर आर्टिफिशियल पैंक्रियाज बना लिया है। शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि यह ब्लड में ग्लूकोज की मात्रा को संतुलित रखेगा। संभवतया वर्ष 2018 से यह यूरोपीय बाजार में उपलब्ध होगा। सर्जरी के जरिये इसे शरीर में फिट करने के बाद आर्टिफिशियल पैंक्रियाज इंसुलिन की मात्रा को नियंत्रित करता रहेगा। इससे टाइप-1 डायबिटीज के पीडि़तों को काफी सहूलियत मिलेगी। इससे बार-बार इंजेक्शन के दर्द से निजात मिलेगी। आस्ट्रेलिया के अस्पतालों में पांच सालों से इसका क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है।

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