हमें महिला का स्टेटस स्वीकार करना होगा : अदाकार रमेश बोहरा

Patrika news network Posted: 2017-04-16 08:43:31 IST Updated: 2017-04-16 17:09:04 IST
हमें महिला का स्टेटस स्वीकार करना होगा : अदाकार रमेश बोहरा
  • राजस्थान के वरिष्ठ रंगकर्मी रमेश बोहरा का कहना है कि धींगा गवर मेले में नकल या पाश्चात्यता नहीं होना चाहिए। अफसोस कि अब इसमें डीजे हावी हो गया है और फिल्मी व भौंडे गाने अपना लिए गए हैं। उन्होंने पत्रिका से एक बातचीत में कहा कि हमें महिला का स्टेटस स्वीकार करना होगा।

जोधपुर

राजस्थान के एक नामी फनकार और रंगकर्मी हैं जोधपुर के रमेश बोहरा। वे खुद में कला को जीते हैं। अदाकारी हो या एन्करिंग, बोहरा रौबीली और गर्वीली आवाज के मालिक हैं। उनका बातचीत करने और डायलॉग डिलीवरी का एक खास अंदाज है। वे 12 जनवरी 1949 को बीकानेर में पैदा हुए। वे बॉलीवुड, हॉलीवुड व राजस्थानी फिल्मों में अदाकारी कर चुके हैं। रंगकर्म की बात करें तो महाभारत उनका पहला नाटक था। अब तक 120 से अधिक नाटकों में अभिनय कर चुके हैं। उन्होंने गालिब 1857 और संध्या छाया नाटकें में यादगार अदाकारी की थी। बोहरा पिछले 28 साल से वीर दुर्गादास का रोल कर रहे हैं। बरसों पहले रेलवे में नौकरी के कारण जोधपुर आए और फिर यहीं के हो कर रह गए। पेश है बोहरा से बातचीत के अंश :

पत्रिका -स्वांग को सामाजिक मानसिक रूप से हमेशा से सम्मान दिया गया है। आपक ी नजर में स्वांग का क्या महत्व है?

बोहरा- जोधपुर के धींगा गवर के दौरान तीजणियां 16 दिन तक आस्था में डूबी हुई रहती हैं। देवताओं के एेतिहासिक पात्र 16 दिन तक निभाए जाते हैं। थिएटर में कैरेक्टर होता है। माफ करें यहां स्वांग केवल एक मूर्ति है, भाव नहीं हैं। बन कर आते हैंशिव और बात कुछ और करते हैं। स्वांग में बाहरी आवरण नहीं, भाव होना चाहिए। शास्त्रों में स्वांग का मतलब यह नहीं है।

पत्रिका- स्त्रियों का पुरुष बनना ओर पुरुषों का स्वी बनना हमारे यहां उत्सव क्यों है?

बोहरा- क्यों कि यह उनकी अपनी काबिलियत होती है। इसे शास्त्रीय आध्याात्मिक मिथ समझ सकते हैं। जोधपुर का धींगा गवर एक अंतरराष्ट्रीय मेला है। इसमें खुल कर मस्ती होती है। वीमन लीड है। वह सबकुछ कर सकती है। नारी को पुरुष और पुरुष को नारी बनाना स्वांग है। कहीं न कहीं सामंजस्य की जरूरत है। स्त्री और पुरुष समाज के दो पहिये हैं। इस मेले में पहले पुरुष सामने नहीं आते थे। यह बेंतमार नहीं, धींगा गवर उत्सव है। लोक भावना की, नारी भावना की अभिव्यक्ति के कारण यह उत्सव है।

पत्रिका -कला -अभिनय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मेकअप, रूपसज्जा, साजसज्जा और शृंगार है। इसके क्या फायदे हैं?

बोहरा-साज सज्जा और शृंगार से रूप लावण्य दिखता है। खूबसूरती बनाव सिंगार से रूप सौंदर्य में निखार आता है। शृंगार से सौंदर्य संवरता है। जब शृंगारित व्यक्ति कोई एक्ट करता है तो उसमें आत्मविश्वास झलकता है। क्यों कि उसके मन में यह भाव होता है कि उसकी लुकिंग अच्छी है। यानी रूपसज्जा आत्मविश्वास का कारक बनता है।

पत्रिका - पुराने शहर की सजधज जोधपुर को कैसे खास बनाती है?

बोहरा-पुरा वैभव, हमारे सात द्वार और उनमें हथाइयांें के साथ लोक संस्कृति अपणायत, लोक गीत, लोक संगीत, लोक पहनावा, हर चीज में जोधपुरी शान नजर आती है। इस जोधपुरी सजधज बणी ठणी दुल्हन की तरह होती है। यह परंपरा बनी रहना चाहिए।

पत्रिका- धींगा गवर मेले में महिलाओं की भागीदारी- भीड़ बढ़ रही है, अच्छी बात है, लेकिन इसमें कुछ कमियां भी सामने आ रही हैं। क्या आप उस पर प्रकाश डालेंगे?

बोहरा-हमें सबकुछ ऑरिजनल चाहिए। धींगा गवर मेले में नकल या पाश्चात्यता नहीं होना चाहिए। अफसोस कि अब इसमें डीजे हावी हो गया है और फिल्मी व भौंडे गाने अपना लिए गए हैं। आज महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं। युवा पीढ़ी यह संस्कार नहीं भूले कि स्त्री मां भी है और वह बहन भी है। हम मध्यकालीन उस स्थिति से बड़ी मुश्किल से बाहर निकले हैं जहां महिला को पीछे समझा जाता था। वो मां बहन गुरु और पत्नी है। हमें उसका स्टेटस स्वीकार करना होगा। 

rajasthanpatrika.com

Bollywood