#BanChildMarriage: शादी नहीं शोषण है बाल विवाह, रस्मों तले यूं दबाए जाते हैं कोमल 'फूल'

Patrika news network Posted: 2017-04-17 19:50:38 IST Updated: 2017-04-17 19:50:38 IST
  • मां बनना, एक औरत की जिंदगी का सबसे सुखद अनुभव होता है, लेकिन वही अनुभव अभिशाप बन जाए तो...

जोधपुर

मां बनना, एक औरत की जिंदगी का सबसे सुखद अनुभव होता है, लेकिन वही अनुभव अभिशाप बन जाए तो... बिल्कुल एेसा ही हुआ सुमता (परिवर्तित नाम) के साथ... 12 साल की उम्र में शादी और 14 की उम्र में मां बनी, लेकिन उसका शरीर और मन शायद इस जिम्मेदारी के लिए तैयार नहीं था। गर्भकाल में उसे शारीरिक रूप से कई पीड़ाएं सहन करनी पड़ीं। गर्भावस्था में अपना ध्यान कैसे रखना है उस अबोध को नहीं पता था और इस बारे में किसी से पूछने में भी वह संकोच महसूस करती थी.. आखिर नौ माह पूरे हुए और मातृत्व के सुख को जीने के लिए उसके शरीर ने साथ नहीं दिया, उधर उसका बच्चा भी कुपोषण के कारण जी ना सका।


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वहीं धनिया जिसकी उम्र 15 वर्ष थी, को उसके दुगुने उम्र के आदमी के साथ ब्याह दिया गया। कच्ची उम्र में उसके शरीर ने कई यात्नाएं झेलीं और फिर जब दुर्बल शरीर कोई और यात्ना झेलने के लायक ना रहा तो उसे डॉक्टर के पास भेज दिया गया। रिपोर्ट्स हाथ में आने पर उसके पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी। वो एचआईवी पॉजिटिव थी। उसकी किस्मत तो पहले ही ठगी जा चुकी थी, आज जिंदगी ने भी उसे छल लिया। 


21वीं सदी का डिजिटल भारत, जहां औरतें राष्ट्रपति बन कर देश चला रही हैं तो पायलट बन कर आसमान जीत रही हैं। उसी देश में पिछले 88 सालों से कोमल बच्चों को रस्मों के नाम पर दबाया जा रहा है। मैंने नौ सालों में एेसी बच्चियों के दुख को बहुत करीब से देखा है। ये कहना है सारथी ट्रस्ट की मैनेजिंग ट्रस्टी और पुनर्वास मनोवैज्ञानिक कृति भारती का। 


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बाल विवाह एक त्रासदी है, जिसमें बच्चों का व्यक्तित्व विकास तो रुकता ही है साथ ही सामाजिक, आर्थिक, मानसिक और शारीरिक नुकसान भी होता है। शादी के बाद बेटी को दूसरे घर जाकर सभी परंपराओं और भूमिकाओं का निर्वहन करना होता है, जिसके लिए वे मानसिक रूप से तैयार नहीं होतीं। साथ ही लड़के भी इस जिम्मेदारी के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होते हैं। ये स्थिति अलगाव व अवसाद की ओर ले जाती है। 


लाइलाज रोगों की संभावना

मैंने महसूस किया है कि बाल विवाह बचपन छीन लेता है। खेलने-सीखने की आजादी छिन जाती है। एेसी शादियां जोखिम भी लाती हैं, जिनमें एचआईवी और सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डीजिसेज शामिल हैं। इसके अलावा जिन बच्चियों की छोटी उम्र में शादी होती है उन्हें गर्भावस्था व इससे संबंधित विषयों पर जानकारी नहीं होती। इसका असर उनके व होने वाले बच्चे के शरीर पर पड़ता है। बाल विवाह जनसंख्या वृद्धि का भी प्रमुख कारण है। 


बाल मजदूरी को बढ़ावा

कच्ची उम्र के इन पक्के बंधनों से लड़कों पर परिवार की जिम्मेदारी आती है और ये बाल मजदूरी को बढ़ावा देता है। लड़कियों पर भी घरेलू काम लाद दिए जाते हैं, जो उस कोमल उम्र में करने में असमर्थ होती हैं।


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आर्थिक नुकसान

बाल विवाह के बाद लड़की के ससुराल को प्रत्येक त्यौहार पर उपहार स्वरूप कुछ ना कुछ दिया जाता है। शादी पक्की होने के बाद से ही लड़की के घरवालों को वर पक्ष के यहां उपहार भेजने की रस्में शुरू हो जाती हैं, जो उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर ही करती हैं।

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