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ओम पुरी का रंगकर्म में शोषण हुआ था,भानु भारती ने कहा

Patrika news network Posted: 2017-01-09 08:18:03 IST Updated: 2017-01-09 08:18:03 IST
ओम पुरी का रंगकर्म में शोषण हुआ था,भानु भारती  ने कहा
  • हिन्दी चित्रपट जगत के महान अदाकार ओम पुरी के निधन से फिल्मी दुनिया और रंग संसार ने एक अजीम अभिनेता खो दिया है। जोधपुर आए उनके मित्र और रंग निर्देशक भानु भारती से राजस्थान पत्रिका ने बातचीत की। पेश है उनसे हुई बातचीत के अंश उन्हीं के हुई बातचीत के अंश उन्हीं के शब्दों में:

जोधपुर / एम आई जाहिर

मशहूर रंगकर्मी, नाट्य निर्देशक व नाटककार भानु भारती अभिनेता ओम पुरी के मित्र हैं और एनएसडी में उनके साथ रहे हैं। उन्होंने ओम पुरी को सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बढ़ते हुए देखा है। राज्य स्तरीय गणतंत्र दिवस समारोह के सांस्कृतिक समारोह की कोरियोग्राफी करने जोधपुर आए हैं। पत्रिका ने उनसे रंगकर्म और अभिनेता ओम पुरी के निधन पर बातचीत की। भारती ने कहा कि वे एक साधारण पंजाबी परिवार से आते थे। बचपन उनका बहुत अभावों में गुजऱा। उन्होंने यह भी कहा कि रंगकर्म के दिनों में उनका शोषण हुआ था।

टिवानी के यहां नौकर की तरह रहे

मां का साया भी उन पर से बहुत जल्दी उठ गया था। पिता फ ौज में मामूली नौकरी करते थे। अक्सर घर से बाहर रहते थे। अभावों के साथ उनका बचपन बहुत एकाकी था। उनके जीवन ने तब मोड़ लिया जब वे अंबाला से अपने ननिहाल पटियाला पहुंचे और उनकी शिक्षा शुरू हुई। प्राइमरी शिक्षा के दौरान उन्होंने पटियाला में कई छोटी-मोटी नौकरियंा कीं । वहीं अभिनय के प्रति उनके लगाव ने जन्म लिया। उस समय एनएसडी के पुराने स्नातक दंपती हरपाल टिवाना और नीना टिवाना पटियाला में रंगकर्म करते थे। ओम उनके साथ पूरी शिद़्दत से जुट गए। एन एस डी के दिनों में वे कभी-कभी  बताते भी थे कि वहां रगकर्म करते हुए भी उनका शोषण कम नहीं हुआ। वे टिवाना दंपती के यहां लगभग घरेलू नौकर की हैसियत से रह रहे थे। इन सबके बावजूद ओम में गजब का संघर्षशील व्यक्ति हमेशा सक्रिय रहा। उनमें अदम्य जीवट था। उसी के चलते वे एनएसडी पहुंचे।

यहां से मेरी उन से अभिन्नता हुई

हम दोनों ने साथ ही 1970 में एनएसडी ज्वॉइन किया था। हम सन 1970 से 1974 तक साथ थे। उन्हें अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती थी। एनएसडी में ज्यादातर पाठ्यक्रम अंग्रेजी में था। छात्रों को जो प्रोजेक्ट सबमिट करने होते थे, वे भी अंग्रेजी में होते थे। हिन्दी का उनका लहजा पंजाबी लिए हुए था। ओम अपना हिन्दी और उर्दू उच्चारण सुधारने में लगे, वहीं अंग्रेजी सीखने की कोशिश भी उनकी रहती थी। यहीं से मेरी उनसे अभिन्नता हुई। वे अपने प्रोजेक्ट्स लिखवाने के लिए मेरे पास आते थे। उनके लगभग सभी प्रोजेक्ट्स लिखने में पूरे तीन साल मैं ही उनकी मदद करता रहा। यहीं से हमारी दोस्ती का आग़ाज भी हुआ, जो जीवन पर्यन्त चली।

पैशन वाला विलक्षण अदाकार

एक अभिनेता के रूप में अपना डिक्शन सुधारने के लिए आेम ने कठिन परिश्रम किया। एनएसडी के रविंद्र भवन में वे अकेले ही रात के 2-2 बजे तक ओपन थिएटर में रिहर्सल किया करते थे। उनका वो परिश्रम और लगन जल्द ही अलकाजी की नजर में भी आया और उन्होंने आेम के सामने अभिनेता के रूप में एक के बाद एक कई चुनौतियां पेश करना शुरू किया। उसमें सबसे पहली और बड़ी चुनौती थी शिवराम कारंत के निर्देशन में कर्नाटक की यक्षगान शैली में प्रस्तुति। कथकली की तरह ही यक्षगान एक सिङ्क्षन्गंग क्लैसिकल थिएटर फॉर्म है, जिसमें नृत्य और मुद्राएं प्रधान होती हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के युवाओं के लिए इसमें अभिनय करना एक बड़ी चुनौती थी। क्यों कि उनके पास इस अभिनय पद्धति का अनुभव दूर-दूर तक नहीं था। और पंजाब की ठेठ ग्रामीण संस्क्ृति से आए आेम के पास तो बिल्कुल ही नहीं। डॉक्टर शिवराम कारंत खुद बहुत मेहनती और लोगों से पूर्ण समर्पण की मांग करने वाले व्यक्ति थे।

ओम ने चुनौती स्वीकार की

ओम ने चुनौती स्वीकार की और जल्द ही डाक्टर कारंत का विश्वास जीत लिया और उन्होंने यक्षगान की मुख्य भूमिका के लिए ओम को चुन लिया। यह हम सबके लिए ओम के नये दर्शन थे। उसके अगले ही वर्ष 1992 में जापानी मूल के अमरीकी नाट्य निर्देशक शोजो सातो एनएसडी में जापान की शास्त्रीय नाट्य पद्धति काबुकी शैली में नाट्य प्रस्तुति के लिए आए थे। इस बार फिर अलकाजी ने कुछ ज्यादा आत्म विश्वास के साथ ओम को आगे कर दिया। जिन लोगों ने काबुकी शैली में प्रस्तुत नाटक इबारागी में ओम को मुख्य भूमिका में देखा है,उनके मन पर किरदार की अमिट छाप आज भी है। अत: जब लोग इस बात पर हैरत करते हैं कि वो आेम जिन्हें अंग्रेजी कम आती थी या आती ही नहीं थी। उन्होंने ब्रिटेन और अमरीका की इतनी ढेर फिल्मों में अंग्रेजी में अभिनय किया तो मुझे ताज्जुब नहीं होता।


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