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ओमपुरी में गजब का संघर्षशील व्यक्ति हमेशा सक्रिय रहा

Patrika news network Posted: 2017-02-11 09:37:42 IST Updated: 2017-02-11 09:45:21 IST
ओमपुरी में गजब का संघर्षशील व्यक्ति हमेशा सक्रिय रहा
  • मशहूर अभिनेता ओमपुरी का पिछले दिनों निधन हो गया। इन दिनों जोधपुर में ओमपुरी फिल्म फेस्टिवल चल रहा है। नाट्य निर्देशक भानु भारती अभिनेता ओमपुरी के मित्र रहे हैं, जोधपुर आए थे। पत्रिका ने उनसे बात की। भारती ने कहा कि ओम में गजब का संघर्षशील व्यक्ति हमेशा सक्रिय रहा। भानु भारती की जुबानी :

जोधपुर

उनका बचपन उनका बहुत अभावों में गुजऱा। वे एक साधारण पंजाबी परिवार से आते थे। मां का साया भी उन पर से बहुत जल्दी उठ गया था। पिता फ ौज में मामूली नौकरी करते थे। अक्सर घर से बाहर रहते थे। अभावों के साथ उनका बचपन बहुत एकाकी था। उनके जीवन ने तब मोड़ लिया जब वे अंबाला से अपने ननिहाल पटियाला पहुंचे और उनकी शिक्षा शुरू हुई। 

अभिनय के प्रति लगाव

प्राइमरी शिक्षा के दौरान उन्होंने पटियाला में कई छोटी.मोटी नौकरियंा कीं । वहीं अभिनय के प्रति उनके लगाव ने जन्म लिया। उस समय एनएसडी के पुराने स्नातक दंपती हरपाल टिवाना और नीना टिवाना पटियाला में रंगकर्म करते थे। ओम उनके साथ पूरी शिद़्दत से जुट गए। एन एस डी के दिनों में वे कभी.कभी  बताते भी थे कि वहां रगकर्म करते हुए भी उनका शोषण कम नहीं हुआ। वे टिवाना दंपती के यहां लगभग घरेलू नौकर की हैसियत से रह रहे थे। इन सबके बावजूद ओम में गजब का संघर्षशील व्यक्ति हमेशा सक्रिय रहा। उनमें अदम्य जीवट था। उसी के चलते वे एनएसडी पहुंचे।

यहीं से हमारी दोस्ती का आग़ाज हुआ

हम दोनों ने साथ ही 1970 में एनएसडी ज्वॉइन किया था। हम सन 1970 से 1974 तक साथ थे। उन्हें अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती थी। एनएसडी में ज्यादातर पाठ्यक्रम अंग्रेजी में था। छात्रों को जो प्रोजेक्ट सबमिट करने होते थेए वे भी अंग्रेजी में होते थे। हिन्दी का उनका लहजा पंजाबी लिए हुए था। ओम अपना हिन्दी और उर्दू उच्चारण सुधारने में लगे, वहीं अंग्रेजी सीखने की कोशिश भी उनकी रहती थी। यहीं से मेरी उनसे अभिन्नता हुई। वे अपने प्रोजेक्ट्स लिखवाने के लिए मेरे पास आते थे। उनके लगभग सभी प्रोजेक्ट्स लिखने में पूरे तीन साल मैं ही उनकी मदद करता रहा। यहीं से हमारी दोस्ती का आग़ाज भी हुआ, जो जीवन पर्यन्त चली।

अकेले रात के 2.2 बजे तक रिहर्सल करते थे

एक अभिनेता के रूप में अपना डिक्शन सुधारने के लिए ओम ने कठिन परिश्रम किया। एनएसडी के रविंद्र भवन में वे अकेले ही रात के 2.2 बजे तक ओपन थिएटर में रिहर्सल किया करते थे। उनका वो परिश्रम और लगन जल्द ही अलकाजी की नजर में भी आया और उन्होंने ओम के सामने अभिनेता के रूप में एक के बाद एक कई चुनौतियां पेश करना शुरू किया। उसमें सबसे पहली और बड़ी चुनौती थी शिवराम कारंत के निर्देशन में कर्नाटक की यक्षगान शैली में प्रस्तुति। कथकली की तरह ही यक्षगान एक सिक्षन्गंग क्लैसिकल थिएटर फॉर्म है, जिसमें नृत्य और मुद्राएं प्रधान होती हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के युवाओं के लिए इसमें अभिनय करना एक बड़ी चुनौती थी। क्यों कि उनके पास इस अभिनय पद्धति का अनुभव दूर.दूर तक नहीं था। और पंजाब की ठेठ ग्रामीण संस्क्ृति से आए ओम के पास तो बिल्कुल ही नहीं। डॉक्टर शिवराम कारंत खुद बहुत मेहनती और लोगों से पूर्ण समर्पण की मांग करने वाले व्यक्ति थे।

ओम ने चुनौती स्वीकार की

ओम ने चुनौती स्वीकार की और जल्द ही डाक्टर कारंत का विश्वास जीत लिया और उन्होंने यक्षगान की मुख्य भूमिका के लिए ओम को चुन लिया। यह हम सबके लिए ओम के नये दर्शन थे। उसके अगले ही वर्ष 1992 में जापानी मूल के अमरीकी नाट्य निर्देशक शोजो सातो एनएसडी में जापान की शास्त्रीय नाट्य पद्धति काबुकी शैली में नाट्य प्रस्तुति के लिए आए थे। इस बार फिर अलकाजी ने कुछ ज्यादा आत्मविश्वास के साथ ओम को आगे कर दिया। जिन लोगों ने काबुकी शैली में प्रस्तुत नाटक इबारागी में ओम को मुख्य भूमिका में देखा है। उनके मन पर किरदार की अमिट छाप आज भी है। अतरू जब लोग इस बात पर हैरत करते हैं कि वो ओम जिन्हें अंग्रेजी कम आती थी या आती ही नहीं थी। उन्होंने ब्रिटेन और अमरीका की इतनी ढेर   फिल्मों में अंग्रेजी में अभिनय किया तो मुझे ताज्जुब नहीं होता।

  ( जैसा रंगकर्मी भानु भारती ने पत्रकार एम आई जाहिर को बताया )

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