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जोधपुर की थीं पहली चरित्र अभिनेत्री : सरितादेवी

Patrika news network Posted: 2017-05-02 08:28:33 IST Updated: 2017-05-02 08:28:33 IST
जोधपुर की थीं पहली चरित्र अभिनेत्री : सरितादेवी
  • बॉलीवुड में मरुधरा का एक एक फनकार फिलर नहीं, पिलर की हैसियत रखता है। एेसे ही फनकारों में एक नाम है सरितादेवी।जोधपुर के माणक चौक की मैना बचपन में ही पिता के साथ मुंबई पहुंचीं और मायानगरी में सरितादेवी के नाम से जानी गईं। उन्होंने रामायण में शबरी बन कर लोगों में राम भाव जगाया।

जोधपुर

हिंदी फि ल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने वालों में राजस्थान से जुड़ी अभिनेत्रियों में सबसे पहले सरिता देवी का नाम प्रमुख है। उनका जन्म : 23 नवंबर 19 25 और निधन 26 जून 2001 को हुआ।उन्होंने शबरी से पहले मेगा सिल्वर स्क्रीन पर 200 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया। इस अदाकारा ने 1 9 40 के कुछ समय में अपनी अदाकारी के कॅरियर की शुरूआत की थी। 

पिता ने हौसला बढ़ाया

उस जमाने में महिलाएं अभिनय जगत में नहीं आ पाती थीं। महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखा गया था। उनके पिता पूनमचंद चौहान ने उनका हौसला बढ़ाया और पर्दे पर उनका अभिनय पसंद किया जाने लगा। रूसी फिल्म द फ ॉल ऑफ बर्लिन (19 50) की डबिंग के लिए उन्हें डायमंड पिक्चर्स ने सम्मानित किया था।

कुछ घर के बारे में

सरिता देवी का जन्म 23 नवंबर 1 9 25 को जोधपुर राजस्थान में पूनमचंद चौहान के यहां हुआ था। उनका घर का नाम मैना था। सरितादेवी अपने पिता के साथ मायानगरी पहुंची थीं। उनकी पुत्री विजयश्री गोहिल बताती हैं कि वे बचपन में ही करीब 1950 के दशक के आसपास मुुंबई पहुंची थीं। सरितादेवी का लालचंद गोहिल के साथ विवाह हुआ। सरितादेवी का 26 जून 2001 और लालचंद गोहिल का कुछ अरसा पहले निधन हुआ। सरितादेवी के दो पुत्र और एक पुत्री है। इनमंें पुत्र जीवराज गोहिल बड़े, उनसे छोटी बेटी विजयश्री गोहिल और सबसे छोटा बेटा सतीश गोहिल है। ये सब मुंबई्र में रहते हैं। जोधपुर में उनका माणक चौक में निवास था। 

स्ट्रगल से मंजिल तक

मुंबई तक पहुंचने के शुरुआती संघर्ष के बाद उन्होंने पहली फि ल्म तोहफ ा (19 47) में सहायक भूमिका निभाई थी। उस वक्त वे सिर्फ 22 साल की थीं। उन्हें आरिवाज (1 9 47) पारो की मां, हिप हिप हुर्रा : चौबेजी ( 1 9 48 ) निरूपा रॉय की बुआ चुररिया (19 48) चाकोरी (1 9 4 9) आदि में यादगार अदाकारी की। तब से पूरे करियर के दौरान उन्होंने सिर्फ चरित्र भूमिका निभाई और माँ, नानी, दादी, मौसी, बुआ, ममी, बहन, भाभी, घरेलू कलाकार और देखभाल करने वाली वगैरह जैसे विभिन्न सहायक पात्र पर्दे पर साकार किए। इस प्रकार सरिता देवी ने हिन्दी फिल्मों में राजस्थान की पहली चरित्र अभिनेत्री बनने का रिकॉर्ड कायम किया।

बडे़ फिल्मकार- शानदार फिल्में

सरितादेवी ने कई बड़े निर्देशकों के साथ काम किया और अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने बिमल रॉय, नितिन बोस, चेतन आनंद, हेमंत गुप्ता, सत्यन बोस, ऋषिकेश मुखर्जी, जे ओम प्रकाश और देव आनंद सहित अन्य प्रमुख फि ल्मकारों का भी ध्यान आकर्षित किया। उनमें से अधिकतर के संग उनका लंबे साथ रहा। सन 1 954 में दो बीघा ज़मीन, बाप बेटीएबिरज बहू, टैक्सी ड्राइवर और तुलसीदास फि़ल्मों में विभिन्न सहायक किरदारों के जरिये फिल्म उद्योग में अपना मुकाम बनाया। इसके अलावा देवदास (1 9 55) हाउस नंबर 44 (1 9 55) फंटुतोश (1 9 56) सोने की चिडिया (1 9 58) लव मैरिज (1 9 59) काबुलीवाला (1 9 61) संगीत सम्राट तानसेन (1 9 62) आई मिलन की वेला (1 9 64), वीर भीमसेन (1 9 64) आये दीन बहार के (1 9 66) द थीफ ऑफ बगदाद (19 68) अभिलाषा (19 68) बलराम श्री कृष्णा(19 68) आप आये बहार आई(19 71) पकीज़ाह (19 72) गाई और गौरी (19 73) गंगा की सौगंध (1978) प्यार झुकता नहीं (19 85) और खुदगर्ज(1987) में यादगार अदाकारी की। सरितादेवी ने गाइड (19 65) दो कलियां (19 68) पैसा या प्यार (19 69) घोड़ा (19 77) और देस परदेस (19 78) और कलयुग और रामायण (19 87)में भी खूबसूरत अभिनय किया था।

भाषाई रंगमंच और क्षेत्रीय फिल्में

अपने शुरुआती सालों के दौरान उन्होंने राजस्थानी, मराठी और गुजराती रंगमंवच पर काम किया। इसी तरह उन्होंने क्षेत्रीय फि ल्मों में भी काम करना जारी रखा। राजस्थानी में 6 फि ल्में, गुजराती में 8 ,भोजपुरी में 4 और मराठी- बंगाली और हरियाणवी में प्रत्येक एक-एक फि ल्म में काम किया। उनकी गुजराती फि ल्मों में मंगल फेरा (1949)जीवनो जुगारी (19 63) और सत्यवान सावित्री (19 63)उल्लेखनीय रहीं। मराठी फि ल्म उमाजी नाइक (19 60) मेंजमींदार की बहन की भूमिका निभाई। उन्होंने राजस्थानी फि ल्मों में बाबो सा री लाडली (19 61) नानी बाई रो मायरो (19 63) बाबा रामदेव (19 63) लाज राखोराणी सती (19 73) और गणगौर (19 82) फिल्में अहम रहीं।

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