सुकून के शहर में जुर्म का यह कैसा जहर ?

Patrika news network Posted: 2017-05-14 09:38:14 IST Updated: 2017-05-14 09:38:14 IST
सुकून के शहर में जुर्म का यह कैसा जहर ?
  • अमन पसंद शहर की सब तारीफ करते थे। सुकून के शहर जोधपुर अपराध अधिक होने लगे हैं। दूसरे शहरों के अपराधी आने लगे हैं। शहर की फिजा बिगडने लगी है। लोगों का मिजाज बदलने लगा है। यह शहर सदियों से शहरे-सुकून माना जाता है, इसे सभी लोग एक सुरक्षित शहर मानते थे, लेकिन अब यह शहर वो शहर नहीं रहा।

जोधपुर

अमन पसंद शहर की सब तारीफ करते थे। सुकून के शहर जोधपुर  अपराध अधिक होने लगे हैं। दूसरे शहरों के अपराधी आने लगे हैं। शहर की फिजा बिगडने लगी है। लोगों का मिजाज बदलने लगा है। यह शहर सदियों से शहरे-सुकून माना जाता है, इसे सभी लोग एक सुरक्षित शहर मानते थे, लेकिन अब यह शहर वो शहर नहीं रहा।

अपराधियों के शिकंजे में

सुकून का शहर अपराधियों के शिकंजे में कसमसा रहा है। कभी इस शहर के तो कभी दूसरे शहरों के अपराधी यहां धड़ल्ले से अपराध करने लगे हैं। पिछले कुछ अरसे से इस शहर का सुकून गारत हो गया है। संगत एेसी बदली है कि खरबूजों को देख कर खरबूजे रंग बदलने लगे हैं। अपराधी बेखौफ हुए तो गैंग के नये गुर्गे भी बेखौफ होने लगे। नतीजा यह हुआ कि बरसों पहले जोधपुर में जो अपराध नहीं होते थे, वो अपराध होने लगे। उसके बाद छोटे-मोटे अपराध होना शुरू हुए और अब तो संगीन अपराध होने लगे हैं। एेसे अपराध, शहर जिनके बारे में केवल सुनता था,वे जुर्म यहां नहीं होते थे, किंतु अब ये अपराध शहर को असुरक्षित बना रहे हैं। लोग हैरान परेशान हैं और यह बात चर्चा का विषय है कि आखिर इस शहर को क्या हो गया है? इस ज्वलंत विषय पर सबद आपणे में इस बार शहर के प्रबुद्धजनों से बातचीत :

बेरोजगारी व असंतोष के कारण अपराध

आम आदमी की आपस में सोच मिलना चाहिए। शहर में बेरोजगारी बढ़ गई है। युवाओं मेे असंतोष बढ़ गया है। जोधपुर वही है, लेकिन आज का युवा आक्रामक हो गया है। शांति के लिए आराधना की जाती है। जब व्यक्ति  को इच्छा के अनुसार नहीं मिलेगा तो वह अपराध करेगा। आज का युवा व जनसमूह अशांत है। पहले परकोटे में घर एक दूसरे से सटे हुए थे, अब दूर- दूर हो गए हैं। लोग दूर दूर बस गए हैं। शहर में नये आने वालों का पुलिस के पास विवरण नहीं है। इसलिए बदलाव की आंधी से जोधपुर भी दूर नहीं है। लोग अपने आप में बदलाव लाएं तो शहर भी बदलेगा। पुलिस और कोर्ट युवाओं की भावना समझे।

-अरुण अग्रवाल

प्रमुख उद्योगपति व समाजसेवी

जोधपुर


लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं

मैं यह मानता हूं कि शहर के लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। लोगों के पास संसाधन न के बराबर हैं। यह असंतुलन अपराध बढऩे में सहायक बना। वैश्वीकृत दुनिया में आप अलग हो कर नहीं रह सकते। पहले यह शांति वाला शहर था। जब यह छोटा शहर था तो सब एक दूसरे को जानते थे। घर पास पास थे। अब शहर बड़ा हो गया है। बाहर से लोग आने लगे हैं। शहर में मोबिलिटी बढ़ गई है। अपराधियों ने अपना दायरा बढ़ा लिया है। उस कारण दूसरे शहरों के अपराधी यहां आने लगे हैं। पिछले दिनों अपराध हुए हैं, उनमें से अधिकतर अपराधी स्थानीय नहीं थे। वहीं ओवरऑल जो ग्रोथ हुई है उस कारण भी अपराधों में इजाफा हुआ है।

-विकास बालिया

प्रतिष्ठित अधिवक्ता व चार्टर्ड एकाउंटेंट

शहर का बदलता सत्य -आपराधिक कारण

शहर में अपराध बढऩे का मुख्य कारण जोधपुर का मेट्रो सिटीज से जुडऩा और उन शहर से सीधे रेल मार्ग व बस मार्ग से आवागमन होना है।मनोवैज्ञानिक कारण देखें तो व्यक्ति आज हर एक काम में शॉर्टकट चाहता है, व्यक्ति की इच्छाए बढने लगी हैं जिसे पाने के वह नये-नयें तरीके व्यक्ति अपनाने लगा है और जब इच्छा पूर्ति नहीं होती है तो हीन भावना $और ईष्र्या बढ जाती है, जो अपराध का कारण होती है। घर परिवार में शिक्षित बेरोजगारों पर कमाई का दवाब भी अपराध को बढ़ावा देने का कारण है। इन्टरनेट से भी अपराध को बढ़ावा दे मिल रहा है, जिससे वह अपराध की नई-नई तकनीकी देख सीख रह है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को धैर्य सिखाएं और सामाजिक प्रतिस्पद्र्धा मे सच्चाई व धैर्य से आगे बढ़ें और जितनी जरूरत है उतना ही खर्च करें।

-डॉ.चंद्रकला गोस्वामी

लेक्चरर

मनोविज्ञान विभाग

जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय

जोधपुर


इसलिए अधिक हो रहे हैं अपराध

शहर में अपराध बढऩे के कारणों का मैंने गहराई से अध्ययन किया है। बरसों पुलिस और इस शहर में 

रहा हूं तो सारी चीजें और बातें अच्छी तरह जानता हूं। पुलिस का इकबाल मर चुका है। पुलिस थानों में गुटबंदियां हो गई हैं। पुलिस के आला अफसरों को लीड करना चाहिए, लेकिन हो यह रहा है कि जहां जिसकी गलती देखी, उसे सजा दे रहे हैं। पुलिस में अच्छा काम करने वालों को अवार्ड और रिवार्ड मिलना चाहिए, मगर उन्हें यह नहीं मिल रहा है। पुलिस के लोग पुरानी एेतिहासिक और भौगोलिक जानकारी नहीं लेना चाहते। पुलिस को पता ही नहीं है कि नाकाबंदी कहां करवाना चाहिए। आज शहर के बारे में नहीं जानने वाले पुलिस के अफसर एेसी जगह नाकाबंदी करवाते हैं, जिस जगह अपराधियों का आना जाना ही नहीं होता। बाहर से स्थानांतरित हो कर शहर में आने वाले पुलिस के ज्यादातर अफसर अपने पहले की पेशियों में बिजी रहते हैं। पुलिस को पता ही नहीं कि बाहर से आने वाले लोग गाडि़यों से आ रहे हैं। वह इस बात से भी अनजान है कि किस तरह के अपराधी कहां आ कर डेरा डाल रहे हैं, ये कहां बस गए हैं? दरअसल मुखबिरी और गश्त ढंग से नहीं की जा रही है। दरअसल एकाकी लीडरशिप कारगर थी। अब कई एसपी-एडिशनल एसी हो गए। अभी तो गुडी-गुडी सिस्टम चल रहा है।

-नवलकिशोर पुरोहत

सेवानिवृत अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक

जोधपुर


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