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शीतलाष्टमी पर दो दिन की रहती थी छुट्टी, रामनिवास बाग में जमता था गालीबाजी का अखाड़ा

Patrika news network Posted: 2017-03-20 13:52:17 IST Updated: 2017-03-20 13:52:17 IST
शीतलाष्टमी पर दो दिन की रहती थी छुट्टी, रामनिवास बाग में जमता था गालीबाजी का अखाड़ा
  • रियासतकाल में शीतलाष्टमी पर दो दिन की छुट्टी रहती और एक दिन भट्टियां विश्राम लेती...

जयपुर।

मौसम पलटने के बाद संक्रामक रोगों से बचाने वाली शीतला माता को पूरा ढूंढाड़ 'सैढ़ळ माई' के नाम से पूजता है। रियासतकाल में शीतलाष्टमी पर दो दिन की छुट्टी रहती और एक दिन भट्टियां विश्राम लेती। इस दिन रामनिवास बाग में गालीबाजी का अखाड़ा जमता और तांगा रेहडिय़ों की दौड़ होती। पशु वध व मांस बिक्री पर कड़ा प्रतिबंध था। घरों में भोजन बनाने की सरकारी मुनादी रहती। 


चाकसू में शील डूंगरी पर माता का भोग भी सिटी पैलेस से जाता। सप्तमी पर घरों में गुलगुले, पकौड़ी, पापड़ी, खीचड़ा, राबड़ी, बेसन की चक्की आदि व्यंजन बनते, जिनका दूसरे दिन भोग लगता। माता के पुजारी कुम्हार पहले से ही घरों में पूजन के बर्तन दे जाते। ब्रह्मपुरी शीतला मंदिर के पुजारी कुम्हार हैं, जो माता को ठंडे व्यंजनों का भोग लगाते। 


वर्ष1961 की रिपोर्ट के मुताबिक शीतला माता को चेचक ठीक करने वाली देवी माना  है। 1961 में शील की डूंगरी मंदिर में एक लाख श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचे। डूंगरी पर पशु मेला भी भरता था। गुलाब सिंह मीठड़ी ने बताया कि वर्ष 1964 के पशु मेले में सरकार को 10 हजार रुपए की आय हुई। गांवों में लोग खेजड़ी के नीचे बिराजी महामाई शीतला को भोग लगा परिवार को स्वस्थ रखने की कामना करते हैं। वर्ष 1918 तक ढूंढाड़ में चेचक, बोदरी, प्लेग और लाल बुखार जैसे संक्र्रामक रोगों का दौर आया था। 


सियाशरण लश्करी के मुताबिक माधोसिंह द्वितीय के पुत्र लालजी गोपालसिंह के चेचक ठीक होने पर वे पासवान रूपराय के साथ शील की डूंगरी में धोक देने गए। माता की 36 कौमों में मान्यता रहने के लिहाज से माधोसिंह ने डूंगरी पर 36 खंभों की बारादरी बनवाई। गालीगायन के उस्ताद कैलाश गौड़ ने बताया कि होली के बाद गणगौर पूजने वाली युवतियां व महिलाएं स्त्री-पुरुष का स्वांग रचाकर ढूंढाड़ी गीत गाते हुए बागों में जाती हैं। 


शील डूंगरी पर सवाई जयसिंह द्वितीय के भी जाने का उल्लेख मिलता है। वहां लांगड़ा बाबा की मान्यता है। जिंदा बकरा, मुर्गा और भेड़ चढ़ाने का रिवाज रहा हैं। रामनिवास बाग, रामबाग चौराहा, चौपड़ों पर श्रद्धालु अलगोजे के साथ भजन गाते। शहर में चौराहों व मंदिरों के बाहर बिराजी शीतला की पूजा होती है। 


देवर्षि कलानाथ शास्त्री के अनुसार ढूंढाड़ में शीतला को सैढ़ल माई के नाम से पूजते हैं। चेचक आदि  बीमारी को रोकने को ठंडे भोजन व जल चढ़ाने की परम्परा है।     

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