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ढाई सौ साल पहले इस युद्ध में खंडेलवाल महाजनों ने चलाईं तलवारें, रोचक है खून बहने की कहानी

Patrika news network Posted: 2016-10-23 17:40:07 IST Updated: 2016-10-23 17:40:07 IST
ढाई सौ साल पहले इस युद्ध में खंडेलवाल महाजनों ने चलाईं तलवारें, रोचक है खून बहने की कहानी
  • अलवर के प्रताप ङ्क्षसंह नरुका से अनबन होने के बाद हल्दिया ने नजफ खान की सेना लेकर रसिया की डूंगरी पर हमला बोला था। 14 सितम्बर 1767 को राजस्थान के रक्त रंजित युद्धों में से था यह युद्ध.....

जयपुर.

ढाई सौ साल पहले मावण्डा युद्ध में खंडेलवाल महाजनों ने युद्ध के मैदान में तलवारें चलाकर अनेक दुशमनों को मौत के घाट उतारने के बाद अंत में ढूंढाड़ के लिए अपना बलिदान कर दिया था। 14 सितम्बर 1767 को राजस्थान के रक्त रंजित युद्धों में से एक मावण्डा के इस लोम हर्षक संग्राम में सौंखिया, हल्दिया और नाटाणी वंश के खंडेलवाल महाजनों ने खुद की सेना के साथ भाग लिया।


महाजनों ने इस युद्ध में भाग लेकर हल्दीघाटी की तरह ढूंढाड़ के लिए साहसिक कार्य किया। हल्दीघाटी युद्ध में सेनापति भामाशाह और ताराचंद जैसे महाजनों ने तलवार चला स्वामि भक्ति का परिचय दिया था। महाजनों ने ढूंढाड़ के लिए भी अपना बलिदान देकर बड़ी मिसाल कायम की।


 भरतपुर के साथ जयपुर की शुरु से ही मित्रता रही लेकिन भरतपुर महाराजा के पगड़ी बदल धर्म भाई बने मारवाड़ महाराजा विजयसिंह के बहकावे में आकर जवाहर सिंह ने जयपुर के माधोसिंह प्रथम के खिलाफ मावंडा के मैदान में युद्ध लड़ा। इस युद्ध में जयपुर की विजय हुई। तराजू को छोड़ तलवार उठाने वाले खंडेलवाल महाजनों में सेठ सहजाराम सौंखिया ४८ सैनिकों के साथ युद्ध में पहुंचे।


अनेक सैनिकों को मारने के बाद सौंखिया भी लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए। इसी तरह नाटाणी गौत्र के सेठ रामचन्द्र नाटाणी ३६ सैनिकों के साथ लड़ते हुए शहीद हुए। खुशालीराम, दौलतराम व नंदराम हल्दिया ने भी युद्ध में तलवारें चलाई। अपनी कुर्बानी देने वाले महाजन वीरों के मावण्डा रणक्षेत्र में सामंतों के साथ स्मारक भी बने हैं। युद्ध में धूला राव की तीन पीडि़यां काम आई। राव दलेल सिंह उसका पुत्र लक्ष्मण सिंह व पोता राजसिंह भी युद्ध में लड़ते हुए काम आए।


इसके अलावा गुमानसिंह मुंडरु, बुद्ध सिंह सीकर,उम्मेद सिंह महार,गुमान सिंह पचार, शिवदास धानोता, बहादुर सिंह बागावास,नाहर सिंह इटावाबंशी सिंह जोबनेर आदि सैकड़ों योद्धाओं ने वीरगति पाई। युद्ध में कुर्बानी देने महाजनों के जयपुर में सौंखियों का रास्ता,नाटाणियों का रास्ता हल्दियों का रास्ते बने हैं। सियाशरण लश्करी के मुताबिक जौहरी बाजार में केवल हल्दिया की हवेली का दरवाजा बाजार में खुलता है।


गंगा माता का सेवक छाजूराम हल्दिया अपना परिवार व सम्पति को छोड़ भक्ति के लिए गंगा घाट चला गया। वर्ष१७८० में दौलतराम हल्दिया सिकराय का सामंत बनाया, जहां उसने गढ़ बनवाया। अलवर के प्रताप ङ्क्षसंह नरुका से अनबन होने के बाद हल्दिया ने नजफ खान की सेना लेकर रसिया की डूंगरी पर हमला बोला था।


 20 अप्रेल 1786 को वह लखनऊ नबाव के पास चला गया। सवाई प्रताप सिंह का मराठों से तूंगा का युद्ध हुआ तब वह लखनऊ नवाब की दी हुई पांच लाख की जागीर को छोड़ वापस जयपुर आ गया। - जितेन्द्र सिंह शेखावत।


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