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सबसे बड़े हॉस्पीटल में नशा मुक्ति केन्द्र 19 साल पहले बनाया गया था, सरकार द्वारा अभी तक प्रचार-प्रसार भी नहीं हुआ

Patrika news network Posted: 2017-04-12 16:20:49 IST Updated: 2017-04-12 16:20:49 IST
सबसे बड़े हॉस्पीटल में नशा मुक्ति केन्द्र 19 साल पहले बनाया गया था, सरकार द्वारा अभी तक प्रचार-प्रसार भी नहीं हुआ
  • एसएमएस अस्पताल में 19 साल पहले बना था नशा मुक्ति केन्द्र। न मरीज आ रहे हैं और न ही नशा मुक्ति हो रही है। जबकि डॉक्टर बोले-परिजन कहते हैं कि ठीक नहीं होते मरीज...

जयपुर.

राजस्थान में शराब के खिलाफ जंग जारी है। यहां तक कि महिलाएं सड़कों पर आकर शराब की दुकानों का विरोध कर रही हंै। कोई पति- भाई तो कोई बेटे में शराब की लत से परेशान हैं। इसी लत को दूर करने के लिए एसएमएस अस्पताल में नशा मुक्ति केन्द्र तो बनाया गया है, लेकिन प्रचार-प्रसार नहीं होने के कारण केन्द्र का फायदा पीडि़तों तक नहीं पहुंच रहा।


आलम यह है कि बागंड के ठीक बाहर बाई तरफ 61 नंबर कमरे में 20 बैड का यह केन्द्र हर समय खाली रहता है। केन्द्र में सिर्फ स्टॉफ ही नजर आता है। केन्द्र से जुड़े चिकित्सकों का ही कहना है कि लोगों में जागरुकता की कमी है। वहीं दूसरी ओर इस बात को भी स्वीकारा जा रहा है कि केन्द्र के बारे में प्रचार-प्रसार कार्यक्रम कराए जाने चाहिए, जिससे लोगों को इसकी जानकारी हो सके।


19 साल पहले केन्द्र की सोशल वेलफेयर संस्था की ओर से तकरीबन 20 लाख रुपए की लागत से नशा मुक्ति बनवाया था। जिसे राज्य सरकार को चलाने के लिए सौंपा गया था। तभी से केन्द्र शोपीस बना हुआ है। 20 बैड का यह नशा मुक्ति केन्द्र कितना काम आता है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बैड की सफेद चादर पर एक दाग नजर नहीं आता।


फैक्ट्स से समझिए

1998 में तैयार हुआ था नशा मुक्ति केन्द्र

20 बैड मौजूद हैं केन्द्र में

20 लाख की लागत से बना था केन्द्र


4 मरीज भी नहीं आते रोज औसतन

30 मरीज आते हैं महीने भर में

415 मरीज का आंकड़ा है सालाना

10 से अधिक स्टॉफ लगा हुआ है केन्द्र में


मरीज को 15 दिन तक के लिए भर्ती किया जाता है

चिकित्सकों का कहना है कि मरीज को 15 दिन तक के लिए भर्ती किया जाता है। इस दौरान मरीज का पूरा चेकअप करते हैं। नशे की लत के बारे में कारण जाने जाते है और इलाज शुरू किया जाता है। इस दौरान मरीज की काउंसलिंग भी जाती है। लेकिन जब चिकित्सका से मरीजों के न आने का कारण पूछा गया तो बताया गया कि परिजन कहते हैं कि मरीज पूरी तरह से ठीक नहीें होता। इसीलिए वे मरीज को नहीं लाते। चिकित्सकों का दावा है कि सालाना आने वाले मरीजों में से 70 प्रतिशत ठीक हो जाते हैं।


नशा मुक्ति केन्द्र में जहां खाली पड़े बैड को मरीजों का इंतजार रहता है वहीं केन्द्र से सटे न्यूरो वार्ड की हालत इससे उलट है। न्यूरो वार्ड में मरीजों को बैड नसीब नहीं हो रहे हैं। यहां तक कि मरीजों को जमीन पर लेटे इलाज कराना पड़ रहा है।


केन्द्र में मरीज आउटडोर के जरिए ही भर्ती होते हैं। लोगों को नशा मुक्ति केन्द्र के बारे में जानकारी नहीं है। इसके लिए अलग से टीम बनाकर जागरुकता कार्यक्रम चलाने चाहिए। जिससे पीडि़त लोगों का केन्द्र में इलाज किया जा सके।

डॉक्टर नीरज गर्ग, नशा मुक्ति केन्द्र, एसएमएस अस्पताल।


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