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रिटायरमेंट के पांच साल तक न मिले कोई पदः एसवाय कुरैशी

Patrika news network Posted: 2017-03-20 21:23:15 IST Updated: 2017-03-20 21:23:15 IST
रिटायरमेंट के पांच साल तक न मिले कोई पदः एसवाय कुरैशी
  • संस्थानों की स्वतंत्रता बरकरार रखने के लिए सबसे अधिक जरूरी है कि यहां से रिटायर होने वाले लोगों को कम से कम पांच तक कोई दूसरा पद नहीं देना चाहिए।

नर्इ दिल्ली।

संस्थानों की स्वतंत्रता बरकरार रखने के लिए सबसे अधिक जरूरी है कि यहां से रिटायर होने वाले लोगों को कम से कम पांच तक कोई दूसरा पद नहीं देना चाहिए। संभव हो, तो जीवनभर कोई पद नहीं देना चाहिए। जब तक इंडिपेंडेंट इंस्टीट्यूशन के आला अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद दूसरे पदों का लालच रहेगा, वे सरकार का पक्ष लेते रहेंगे।


पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाय कुरैशी ने यह राय पत्रिका समूह की आेर से यहां आयोजित कीनोट कार्यक्रम में जाहिर की आैर कहा कि संस्थानों की स्वायतत्ता का सबसे बेहतरीन उदाहरण भारत का चुनाव आयोग है। कांस्टीटयूशन क्लब में संस्थाआें की स्वायतत्ता विषयक सेमिनार में कुरैशी ने कहा कि इंडिपेंडेंट इंस्टीट्यूशन का मतलब क्या है या कैसे कोई इंस्टीट्यूट इंडिपेंडेंट बनता है? इसके कुछ मानक हैं, जैसे कि कोई इनसे सवाल नहीं कर सकता, कोई इनके काम में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, इन्हें किसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, इनके अधिकारियाें को सरकार आसानी से हटा नहीं सकती। इनमें नियुक्ति प्रक्रिया बेहद पारदर्शी होती है। यानी इसमें चुनाव सीधे सरकार नहीं करती, बल्कि एक कॉलेजियम चुनाव करता है, जिसमें सरकार के अलावा विपक्ष भी शामिल होता है।  


फिजूल है सीबीआर्इ की स्वायतत्ता पर बहस

उन्होंने कहा कि देश में दो तरह के इंडिपेंडेंट इंस्टीट्यूट हैं। पहला, संवैधानिक संस्थान जैसे कि सुप्रीम कोर्ट, सीएजी, यूपीएससी और चुनाव आयोग। इनको संविधान के जरिए इंडिपेंडेंस प्रदान की गई है। दूसरी तरह के इंडिपेंडेंट इंस्टीट्यूशन वे हैं, जिन्हें कानून के जरिए स्वतंत्रता प्रदान की गई है, जैसे मुख्य सूचना आयोग (सीआईसी) और मुख्य सतर्कता आयोग (सीवीसी)। इनके प्रमुखों की नियुक्ति भी एक कॉलेजियम करता है, जिसमें विपक्ष के नेता भी शामिल होते हैं। पिछले दिनों सीबीआई को स्वतंत्रता देने को लेकर भी खूब बहस हुई थी। यह बहस बेफिजूल है। सीबीआई तो सरकार का ही एक विभाग है। 


जिस समय यह बहस चल रही थी, उस समय के इसके निदेशक क्या गुल खिला रहे थे! हालांकि, जांच एजेंसी को कामकाज में थोड़ी स्वतंत्रता देने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि सरकार इसका दुरुपयोग बहुत करती है। इसे विरोधियों की हालत खराब करने के लिए खूब इस्तेमाल किया जाता है। रिटायरमेंट के बाद इनके निदेशकों को सरकार भी अच्छे पदों पर बैठा देती है। चुनाव आयोग इंडिपेंडेंट इंस्टीट्यूशन का सबसे बेहतर उदाहरण है। यहां नियुक्ति भले ही सरकार करती हो, लेकिन एक बार नियुक्ति होने के बाद हम सरकार से हाथ भर की दूरी रखते हैं। चुनाव आयोग न तो राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी है और न ही प्रधानमंत्री के प्रति, वह सिर्फ देश की जनता के प्रति जवाबदेह है। 


बरकरार रखनी होगी पंचायत राज संस्थाआें की स्वायतत्ता 

टाटा इंस्टीटयूट आॅफ सोशल साइंस के प्रोफेसर एस परशुरमन ने कहा है कि समावेशी विकास के लिए विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को बरकरार रखना जरूरी है। इससे भविष्य के लिए रिसर्च आैर विकास को नर्इ दिशा दी जा सकेगी। विश्वविद्यालय बहुत शानदार संस्थाएं है। ये बेहतरीन मानव संसाधन तैयार करती है। उनके कुलपतियों को पूरी स्वायतत्ता देने से ही अब तक का विकास सम्भव हुआ है। स्वायतत्ता होने से विश्वविद्यालयों में शोध को गति मिलेगी। अगर एेसा होगा तो विकास भी होगा। उन्होंने पंचायत राज संस्थाआें को विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण घटक बताते हुए कहा कि वे ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने में सक्षम है, लेकिन उनकी स्वायतत्ता बरकरार रखनी होगी।


उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को राजनीति से दूर रखना चाहिए। कुलपतियों की नियुक्ति मेरिट के आधार पर हो ना कि राजनीति के आधार पर। कुलपति को विश्वविद्यालय के संचालन के लिए पूरी स्वायत्ता दी जानी चाहिए। उन्होंने स्वयं का उदाहरण देते हुए कहा  कि वे पिछले तेरह साल से टाटा इंस्टीटयूट में इसलिए काम कर पा रहे है क्योंकि वे अपनी जेब में इस्तीफा रखकर चलते हैं। प्रोफेसर ने भविष्य में विकास के लिए संस्थाआें में महिलाआें की नियुक्ति पर भी बल दिया आैर कहा कि कुछ विशिष्ट संस्थाएं मसलन अस्पताल, सेनेटरी, शिक्षा संस्थान एेसे हैं जिनमें ज्यादा से ज्यादा महिलाआें की नियुक्ति की जानी चाहिए। 


आयोग की सलाह माने मतदाता 

कार्यक्रम के प्रश्नोत्तर सेशन में पत्रकार आलोक मेहता के स्वतंत्र चुनाव में मतदाताआें के नाम काटे जाने सम्बंधित सवाल पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि आयोग प्रत्येक मतदाता को चुनाव से पहले खूब ध्यान दिलाता है कि वे मतदाता सूची में अपने नाम को देख लें। वे आयोग की सलाह माने तो राजनीतिक दलों के विरोधी मतदाताआें के नाम सूची से हटाने के आरोप निरर्थक हो जाएंगे। सांसद कर्नल सोनाराम के दूर-दराज के मतदान केन्द्रों के कैप्चर किए जाने के सवाल पर कुरैशी ने कहा कि एेसा नहीं होता है। 


सांसद हरीश मीणा ने कलक्टरों की राजनीतिक आधार पर नियुक्ति का उल्लेख करते हुए पूछा कि एेसे कलक्टर ही जिला निर्वाचन अधिकारी बनते हैं तो उनसे निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है। कुरैशी ने कहा कि आयोग शिकायत मिलने पर एेसे अधिकारियों को तत्काल हटा देता है। कीनोट कार्यक्रम का संचालन कैच न्यूज के भारत भूषण ने किया।

rajasthanpatrika.com

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