मूवी रिव्यू : थ्रिलर-ड्रामा का ज़बरदस्त 'मिक्चर' है फिल्म PINK, यहां जाने आखिर क्यों देखें

Patrika news network Posted: 2016-09-15 16:00:08 IST Updated: 2016-09-15 16:00:08 IST
  • साउथ फिल्मों में अपना हुनर दिखाकर लोगों की वाहवाही लूटने में काफी हद तक सफल रह चुके निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने पहली बार बॉलीवुड इंडस्ट्री की फिल्म के निर्देशन की कमान संभाली है।

- रोहित के. तिवारी/ मुंबई ब्यूरो

बैनर : ए राइसिंग सन फिल्म्स, रश्मि शर्मा फिल्म्स

निर्माता : रश्मि शर्मा, रूनी लहरी, सुजीत सरकार

निर्देशक : अनिरुद्ध रॉय चौधरी

जोनर : थ्रिलर, ड्रामा

संगीतकार : शांतनु मोइत्रा, फैजा मुजाहिद, अनुपम रॉय

स्टारकास्ट : अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू, पीयूष मिश्रा, कीर्ति कुलहाड़ी, एंड्रिया तरंग, ध्रितिमन चटर्जी, अंगद बेदी

रेटिंग :  दो स्टार



साउथ फिल्मों में अपना हुनर दिखाकर लोगों की वाहवाही लूटने में काफी हद तक सफल रह चुके निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने पहली बार बॉलीवुड इंडस्ट्री की फिल्म के निर्देशन की कमान संभाली है। उन्होंने लड़कियों की जिंदगी पर आधारित एक मुद्दे को अपने निर्देशन के जरिए बड़े पर्दे पर उकेरने का पूरा प्रयास किया है। साथ ही उन्हें इस फिल्म से काफी उम्मीदें भी हैं।  



कहानी : 

कहानी एक घटना से शुरू होती है, जहां मिस मीनल अरोड़ा (तापसी पन्नू) अपनी दो फ्रेंड्स फलक (कीर्ति कुलहाड़ी) व एंड्रिया (एंड्रिया तरंग) के साथ बहुत ही डरी और सहमी हुई अपने घर सूरज कुंड पहुंचती है। वहीं रह रहे एडवोकेट दीपक सावंत (अमिताभ बच्चन) की नजर उन पर पड़ जाती है। वहीं दूसरी तरफ साउथ दिल्ली के दबंग और ओहदे वाले रंजीत सिंह के भतीजे राजवीर सिंह (अंगद बेदी) को उसके दोस्त अंकित मल्होत्रा और रौनक आनंद उसे खून से लथपथ अवस्था में अस्पताल ले जाते हैं, जहां डॉक्टर बताते हैं कि अगर जरा सा भी इधर-उधर हो जाता तो राजवीर की आंख भी जा सकती थी। 


इधर, डरी-सहमी तीनों लड़कियां एक-दूसरे को ढांडस बंधाती हुई दिखाई देती हैं कि तभी राजवीर के दोस्त डम्पी (राशुल टंडन) का फोन उन लड़कियों के मकान मालिक के पास जाता है और वह कहता है कि वह लड़कियों से अपना फ्लैट खाली करवा ले। इधर, राजवीर के दोस्त एंड्रिया को परेशान करते हैं और फलक की गंदी तस्वीर को वायरल कर देते हैं, जिससे उसकी जॉब भी चली जाती है। साथ ही अरोड़ा को अचानक उसके दोस्त किडनैप कर लेते हैं और उसके साथ कुकर्म करते हैं और धमकी देते हैं कि वह यह बात किसी से भी न बताए। 

अब तीनों लड़कियां परेशान होती हैं और उनसे कम्प्रोमाइज करने का प्रयास करती हैं, इसके लिए विश्वा (तुषार पांडेय) राजवीर से मिलता है, लेकिन बात नहीं बनती। अब मीनल अरोड़ा पुलिस में शिकायत करने की ठान लेती है, राजवीर के चाचा रंजीत की वजह से उसकी वहां भी नहीं सुनी जाती। फिर दीपक सावंत के कहने पर पुलिस कम्प्लेंट होती है और अचानक सूरज कुंड फरीदाबार थाने की पुलिस मीनल के घर पहुंचकर उसे घर से उठा लाती है। अब मीनल और उसके घर वालों को यह भी समझ नहीं आता कि जब शिकायत उसने दर्ज कराई थी तो भला उसे ही पुलिस ने गिरफ्तार क्यों कर लिया। बहरहाल, दीपक सावंत की मदद से उसे जमानत तो मिल जाती है, लेकिन केस लडऩे की लड़ाई जारी रहती है। इसी के साथ कहानी में ट्विस्ट आता है फिल्म तरह-तरह के मोड़ लेते हुए आगे बढ़ती है। 


अभिनय : 

इंडस्ट्री के अपने अभिनय का लोहा मनाने में सफल रहे सदी के महानायक अमिताभ बच्चन अपने किरदार दीपक पर पूरा कंसन्ट्रेट करते दिखाई दिए। उन्होंने एक वकील की भूमिका को जीवंत करने के लिए हर तरह के प्रयास किए, जिसमें में काफी सफल भी रहे। साथ ही तापसी पन्नू ने भी अपने रोल को बखूबी निभाया है। उन्होंने अपने अभिनय से साबित कर दिखाया है कि किरदार में दम होना बहुत जरूरी है। पीयूष मिश्रा ने अपने किरदार को शत-प्रतिशत दिया है और वे एक वकील के तौर पर अभियुक्त की तरफदारी करते अपने ही अंदाज में दिखाई दिए। इस फिल्म में भी बहुत ही एनेर्जेटिक लहजे में दिखाई दिए। अंगद बेदी समेत कीर्ति कुलहाड़ी और एंड्रिया तरंग ने अपने-अपने अभिनय में निखार लाने के लिए हर संभव प्रयास किया है, जिसमें वे कई मायनों में सटीक भी रहे। इसके अलावा ध्रितिमन चटर्जी ने भी अपनी उपस्थित दर्ज कराने मेें कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। 


निर्देशन: 

बॉलीवुड के नवनिर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने पहली ही बार में अपने निर्देशन में थ्रिलर और इमोशन का जोरदार तड़का लगाया है। उन्होंने अपने निर्देशन में कोई हर संभव प्रयास किया है, साथ ही उन्होंने इसमें कुद एक नए प्रयोग भी किए हैं। उन्होंने फिल्म में लड़कियों से जुड़े मुद्दे को हर तरह से दिखाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन कहीं-कहीं वे थोड़ा असफल से रहे। थ्रिलर और इमोशनल जैसी फिल्म में चौधरी ने वाकई कुछ अलग कर दिखाया है, जिसकी वजह से वे ऑडियंस की वाहवाही लूटने में कुछ हद तक सफल रहे। फिल्म का फर्स्ट हॉफ तो दर्शकों को पसंद आता है, लेकिन सेकेंड हॉफ की पूरी कहानी एक कोर्ट रूम में ही सिमट कर रह जाती है, जो ऑडियंस को अखरता सा है। बहरहाल, 'जो लड़की मदिरा-पान करती है, इसका मतलब वह किसी के साथ...' और 'नहीं, को किसी भी व्याख्या की जरूरत नहीं होती...' जैसे कुछ डायलॉग तारीफ लायक रहे, लेकिन अगर सनेमेटोग्राफी और टेक्नोलॉजी को छोड़ दिया जाए तो इस फिल्म कॉमर्शिल अंदाज में कुछ अलग कर दिखाने की जरूरत सी महसूस हुई।      



क्यों देखें : 

देश में लड़कियों से जुड़े मुद्दों को समझने और सीखने के लिहाज से आप बेझिझक सिनेमाघरों की ओर रुख कर सकते हैं, आगे जेब और इच्छा आपकी...!

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