Movie Review: प्यार और एब्यूज का मतलब समझाती 'कहानी 2'

Patrika news network Posted: 2016-12-02 14:32:08 IST Updated: 2016-12-02 14:32:21 IST
Movie Review: प्यार और एब्यूज का मतलब समझाती 'कहानी 2'
  • 'कहानी' की अपार सफलता के बाद निर्देशक सुजॉय घोष इस बार इसकी फ्रेचाइजी लेकर आए हैं। इंडस्ट्री को अपने निराले अंदाज में फिल्मों परोसने के शौकीन घोष ने इस फिल्म में भी थ्रिलर का धमाकेदार तड़का लगाने का प्रयास पूरा किया है। साथ ही उन्हें इससे पहले जैसी सफलता की चाहत भी है।

रोहित के. तिवारी/ मुंबई

'कहानी' की अपार सफलता के बाद निर्देशक सुजॉय घोष इस बार इसकी फ्रेचाइजी लेकर आए हैं। इंडस्ट्री को अपने निराले अंदाज में फिल्मों परोसने के शौकीन घोष ने इस फिल्म में भी थ्रिलर का धमाकेदार तड़का लगाने का प्रयास पूरा किया है। साथ ही उन्हें इससे पहले जैसी सफलता की चाहत भी है।  


कहानी : 

दो घंटे नौ मिनट पछपन सेकंड की कहानी वेस्ट बंगाल के चंदन नगर से शुरू होती है, जहां विद्या सिन्हा (विद्या बालन) अपनी दिव्यांग बेटी मिनी (नायशा खन्ना) के साथ हंसी-ख़ुशी रह रही होती है। एक दिन मिनी की नर्स नहीं आती है तो विद्या को ऑफिस जाने के लिए लेट जोता है तो वह बेटी मिनी को घर में अकेला ही छोड़ कर अपने ऑफिस चली जाती है। फिर जब वह शाम को ऑफिस से छूटती है तो जब वह घर पहुंचती है, वहां से उसकी दिव्यांग बेटी लापता मिलती है। फिर अचानक विद्या के घर एक फोन आता है तो वह अपनी बेटी को ढूंढने के लिए रात के अंधेरे में निकल पड़ती है कि एकाएक उसका एक्सीडेंट हो जाता है। 


उस एक्सीडेंट की छानबीन के लिए सब-इंस्पेक्टर इंद्रजीत सिंह (अर्जुन रामपाल) को लगाया जाता है, लेकिन इंद्रजीत उसे दुर्गा रानी सिंह के नाम से जानता है। फिर इंद्रजीत को पूछताछ में पता चलता है कि वह रानी नहीं, बल्कि विद्या सिन्हा है। इस पर इंद्रजीत को विद्या के घर से एक डायरी मिलती है, जिसमें विद्या अपनी पूरी दिनचर्या रोजाना लिखती थी। उस डायरी से इंद्रजीत को पता चलता है कि वह विद्या ही दुर्गा रानी है, जो किसी मजबूरीवश चंदन नगर में वह अपनी बेटी मिनी के साथ रह रही होती है। 


अब इधर डायरी के जरिए विद्या की कहानी का पता चलता कि मिनी आखिर दिव्यांग कैसे हो जाती है...। वहीं दूसरी तरफ इंद्रजीत को भी सच्चाई का पता चल जाता है कि विद्या की बेटी मिनी नहीं है, वह तो सिर्फ उसकी हिफाजत के लिए विद्या सिन्हा बनती है। इसी के साथ फिल्म दिलचस्प मोड़ लेते हुए आगे बढ़ती है। 


अभिनय : 

अर्जुन रामपाल ने इसमें खुद को साबित करने की कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है, जिसमें वे काफी हद तक सफल भी रहे हैं। साथ ही विद्या बालन ने इस बार भी खुद को कैरेक्टर की तह तक जाने की पूरी कोशिश की है, जिसके कारण इस बार भी वे खुद को अलग अंदाज में दिखा पाने में कामयाब रहीं। नायशा खन्ना ने मिनी का गजब रोल अदा किया है। जुगल हंसराज और टोटा रॉयचौधरी ने भी अपने-अपने किरदारों को जीने का पूरा प्रयास किया है। खराज मुखर्जी, कौशिक सेन समेत मानिनी चड्ढा ने अपने-अपने रोल का जरूरत के मुताबित जान डालने की पूरी कोशिश की है। इसके अलावा फिल्म में सभी एक्टर निर्देशक के मुताबिक ही खुद को दिखाने में कई मायनों में बेमिसाल रहे।


निर्देशन : 

बॉलीवुड को अपने निराले अंदाज में फिल्में परोसते आए निर्देशक सुजॉय घोष के निर्देशन में कोई शक नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसमें अपनी पिछली फिल्म की तरह ही गजब का थ्रिलर परोसने की पूरी कोशिश की है, लेकिन कहीं-कहीं थोड़ा और बेहतर होने की कमी भी खली है। फिर भी घोष ने थ्रिलर की कमान संभालने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। उन्होंने इसमें तरह-तरह के प्रयोग तो किए ही हैं, साथ ही इस सिरीज को आगे बढ़ाने वे कई मायनों में कामयाब भी रहे। 


हालांकि उन्होंने फिल्म के जरिए लोगों को एक मैसेज देने का भरपूर प्रयास किया है, इसीलिए वे ऑडियंस की वाहवाही लूटने में सफल रहे। खैर, फिल्म का पहला हिस्सा तो ऑडियंस को बांधे रखने काफी हद तक सफल रहती है, लेकिन सेकंड हाफ में घोष अपनी कहानी से कहीं न कहीं लड़खड़ाते से नजर आए। बहरहाल, वेस्ट बंगाल की पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी तो तारीफ की जा सकती है, लेकिन अगर कॉमर्शिल और टेक्नोलॉजी अंदाज को छोड़ दिया जाए तो इस फिल्म की सिनेमेटोग्राफी में कुछ और खास किया जा सकता था। इसके अलावा फिल्म गीत-संगीत भी ऑडियंस को रिझाने के लिए कई मायनों से ठीक ही रहे।   


बैनर : बाउंडस्क्रिप्ट मोशन पिक्चर्स, पेन इंडिया लिमिटेड

निर्माता : सुजॉय घोष, जयंतीलाल गाडा

निर्देशक : सुजॉय घोष

जोनर : थ्रिलर

संगीतकार : क्लिंटन सेरेजो

स्टारकास्ट : अर्जुन रामपाल, विद्या बालन, नायशा खन्ना, जुगल हंसराज, टोटा रॉयचौधरी, खराज मुखर्जी, कौशिक सेन, मानिनी चड्ढा 

रेटिंग : *** स्टार

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