Ad Block is Banned Click here to refresh the page

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे

बीकानेर में पहली बार दिखाई दिया सिवेट बिज्जू

Patrika news network Posted: 2017-06-18 11:37:14 IST Updated: 2017-06-18 11:37:14 IST
बीकानेर में पहली बार दिखाई दिया सिवेट बिज्जू
  • आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में पाया जाने वाला सीवेट बिज्जू अब मरुस्थली भागों में दिखने लगा है। यह बिज्जू बीकानेर की गोचर भूमि में पहली बार दिखाई दिया है।

बीकानेर

आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में पाया जाने वाला सीवेट बिज्जू अब मरुस्थली भागों में दिखने लगा है। यह बिज्जू बीकानेर की गोचर भूमि में पहली बार दिखाई दिया है। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के वन्यजीव प्रोजेक्ट के लिए विद्यार्थियों ने बीकानेर क्षेत्र में वन्य जीवों का सर्वे किया था। 

read: पीबीएम में व्यवस्था हुई बेपटरी, एक्स-रे विभाग के हालात खराब


इस दौरान विश्वविद्यालय परिसर की गोचर भूमि में छात्रों ने चार कैमरे लगाए थे।  कैमरे में सिवेट की फोटो कैद होने से यहां के जीव विशेषज्ञों में चर्चाओं का दौर जारी है। यह बिज्जू देश में हिमालय, अरावली तथा अन्य पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है। राजस्थान के जोधपुर, बाड़मेर व जालोर के पहाड़ी इलाकों में भी इसे देखा गया है। 



रात को निकलता बाहर 

रात्रिचर होने से यह रात को मांद से बाहर निकलता है। कई बार तो यह लोमड़ी की मांद में जाकर उसे भी भगा देता है और वहीं घर बना लेता है। इसलिए इसे कबर बिज्जू भी कहते  हैं। सीवेट बिज्जू की उम्र 15 से 17 वर्ष की होती है। 



यह साल में एकबार बडिंग करता है और मादा बिज्जू एक बार में चार से छह बच्चे देती है। सीवेट बिज्जू कई फीट गहरे गड्ढे खोदकर मांद तथा ताड़ी के पेड़, खजूर व पाम के पेड़ों पर चढ़कर भी नेस्टिंग करते हैं। 



दोनों तरह का आहार

सिवेट बिज्जू मृत मवेशियों, छोटे कीट-पतंगों, सरिसर्प तथा चूहों को खाता है। वहीं पेड़ पर चढ़कर फल आदि भी खाता है। यह जो बीज खाता है, उसे फैलाता रहता है। इससे जैव विविधता को काफी फायदा पहुंचता है। 



यह है सर्वे की टीम

महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के सर्वे टीम के विद्यार्थियों में ममता, आजाद ओझा, अरुण राजपुरोहित, ओमकंवर राठौड़, प्रीति पाण्डे, नेहा सोलंकी, किशनगोपाल शामिल हैं।



संख्या पता करेंगे

सिवेट बिज्जू पहली बार देखा है। अगले सत्र में इसकी गतिविधियों का पता लगाया जाएगा। इसके लिए स्कॉलर लगाए जाएंगे व संख्या का भी पता लगाया जाएगा। 

डॉ. अनिलकुमार छंगाणी, विभागाध्यक्ष, पर्यावरण विज्ञान,  एमजीएसयू बीकानेर 

rajasthanpatrika.com

Bollywood