शुरू हो गए होलाष्टक, अब शुभ कार्यों से पहले रखें इन बातों का ध्यान, तो खुशियों के रंग लेकर आएगी होली

Patrika news network Posted: 2017-03-05 12:58:23 IST Updated: 2017-03-05 13:00:41 IST
शुरू हो गए होलाष्टक, अब शुभ कार्यों से पहले रखें इन बातों का ध्यान, तो खुशियों के रंग लेकर आएगी होली
  • होली से ठीक आठ दिन पहले होलाष्टक लग जाते हैं, जिनमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इस वर्ष 5 मार्च को अष्टमी तिथि में प्रात: 07 बजकर 43 मिनट के बाद से होलाष्टक लग जाएंगे, जो होलिका दहन के पश्चात दूसरे दिन समाप्त होंगे।

जयपुर

होली स्नेह, प्रेम, सद्भाव और राग-रंग का अद्भुत समन्वय है। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी को यह पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस वर्ष 12 मार्च को होलिका दहन और 13 मार्च को धुलंडी मनाई जाएगी। 



होली से ठीक आठ दिन पहले होलाष्टक लग जाते हैं, जिनमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इस वर्ष 5 मार्च को अष्टमी तिथि में प्रात: 07 बजकर 43 मिनट के बाद से होलाष्टक लग जाएंगे, जो होलिका दहन के पश्चात दूसरे दिन समाप्त होंगे।



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शुभ कार्य रहेंगे निषिद्ध 

धार्मिक और पौराणिक मान्यता के अनुसार होलाष्टक के दिनों में अर्थात अष्टमी से पूर्णमासी के दौरान केतु ग्रह को छोड़कर अन्य आठों ग्रह चंद्रमा, सूर्य, शनि, शुक्र, गुरु, बुध, मंगल और राहु क्रम से उग्र स्वरुप धारण कर लेते हैं इस कारण इन दिनों में शुभ कार्य निषिद्ध समझे जाते हैं। 



होलाष्टक में विवाह, नामकरण, गृह प्रवेश, नए वाहन या संपत्ति की खरीद आदि पर मनाही रहती है। माना जाता है कि होलाष्टक में शुभ कार्य करने से विपरीत परिणाम मिलते हैं तथा कार्य में रुकावट आने से मानसिक और शारीरिक तनाव एवं कष्ट उत्पन्न होता है। 



इसमें शुभ कार्य न करने का तर्क यह है कि भगवान नारायण के भक्त प्रह्लाद को बुआ होलिका के साथ अग्नि में बैठाने के आदेश के बाद दु:ख व्याप्त होने से शुभ कार्य करना अशुभ माना गया। हालांकि होलिका दहन में प्रह्लाद सकुशल बच गए जबकि बुआ अग्नि में ही भस्म हो गई।  



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भक्ति भाव से करें पूजन   

होलाष्टक के प्रथम दिन अर्थात अष्टमी वाले दिन होलिका दहन के लिए चयनित स्थान को गाय के गोबर से लीपकर शुद्ध किया जाता है और वहां आटे एवं हल्दी से स्वास्तिक बनाकर विधिवत पूजा-पाठ के उपरान्त सूखी लकड़ी, कंडे और होली का डंडा स्थापित किया जाता है। 



इस प्रक्रिया के बाद सभी शुभ कार्य बंद कर दिए जाते हैं। होलाष्टक के दौरान गीत-संगीत, पूजा-पाठ, कृष्ण भक्ति से जुड़े भजन आदि किए जा सकते हैं। 



माना जाता है कि ऐसा करने से जीवन में किसी वस्तु का अभाव नहीं रहता तथा सुख, शांति, सद्भाव और प्रेम का संचार होता है। कहते हैं कि जिस दिन भगवान शिव ने कामदेव को क्रोधावेश में आकर भस्म किया था। उस दिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी। तभी से होलाष्टक की शुरुआत मानी जाती है।     

प्रमोद कुमार अग्रवाल 




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