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Video: पढ़िए नरेंद्र कोहली द्वारा रचित महासमर, भाग-36

Patrika news network Posted: 2017-03-18 15:05:22 IST Updated: 2017-03-18 15:05:39 IST
  • शान्तनु ने उसे आश्चर्य से देखा, ‘‘क्या कह रही हो सत्यवती? क्षत्रिय राजकुमार वनों में जाकर ऋषियों के शिष्यत्व में उनके आश्रमों में ही विद्या ग्रहण करते हैं। यही परिपाटी है।’’

‘‘तुम क्या चाहती हो प्रिये!’’ शान्तनु बोले, ‘‘जो चाहोगी, वही प्रबन्ध हो जाएगा।’’

राजा ने जैसे आदेश पाने के लिए सत्यवती की ओर देखा।

सत्यवती ने राजा की याचक दृष्टि को पहचाना। उस दृष्टि ने सचमुच शान्तनु को याचक और सत्यवती को राजरानी बना दिया था।... सत्यवती ने बहुधा पाया था कि उसका अपना मन चाहे उसे आज भी निषाद-कन्या ही मानता रहे, किन्तु शान्तनु की दृष्टि उसे भूमि से उठाकर महारानी के समान कुरुओं के राजसिंहासन पर बैठा देती है; और स्वयं हाथ जोडक़र याचक के समान उसके सामने खड़ी हो जाती है।



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‘‘मेरा पुत्र शिक्षा ग्रहण करने ऋषि कुलों या आश्रमों में नहीं जाएगा।’’

शान्तनु ने उसे आश्चर्य से देखा, ‘‘क्या कह रही हो सत्यवती? क्षत्रिय राजकुमार वनों में जाकर ऋषियों के शिष्यत्व में उनके आश्रमों में ही विद्या ग्रहण करते हैं। यही परिपाटी है।’’



‘‘परिपाटी विधाता का अन्तिम विधान नहीं है।’’ सत्यवती कुछ उग्रता से बोली, ‘‘परिपाटी को स्वीकार या अस्वीकार किया जा सकता है। उसका संशोधन किया जा सकता है। हम नई परिपाटी का निर्माण कर सकते हैं। यदि राजकुमार आश्रम तक जा सकता है, तो गुरु राजमहल तक भी आ सकता है। मेरा पुत्र आश्रम में नहीं जाएगा।’’



शान्तनु ने कुछ रोष और कुछ दुख के साथ सत्यवती की ओर देखा: जब उन्होंने इस निषाद-कन्या से विवाह किया था, तो उन्होंने सोचा भी नहीं था कि इसके मुख में जिह्वा भी होगी। और आज यह इस प्रकार बोल रही है कि राजा शान्तनु को ही जैसे चुप करा देगी। शताब्दियों के अनुभव, चिन्तन और प्रयोग के पश्चात् सहस्रों ऋषियों ने मिलकर कुछ परिपाटियां स्थापित की हैं।... और वह स्वयं, अकेली, एक ही क्षण में नई परिपाटी बनाने का दम्भ कर रही है। नई परिपाटी बनाना तो बहुत बड़ी बात है, यह पुरानी परिपाटी को समझती भी है?... या यह निषाद-कन्या समझती है कि राजप्रासाद में चरण पड़ जाने से यह सम्पूर्ण सृष्टि में सबसे अधिक समझदार प्राणी हो गई... यदि ऐसा समझती भी हो तो क्या बड़ी बात है- अज्ञान ही तो अहंकार को स्फीत करता है...



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‘‘तुम अपने पुत्र को आश्रम में नहीं भेजना चाहतीं।’’ शान्तनु जैसे अपने चिन्तन के बीच अनायास ही कह गये, ‘‘किन्तु यह तुम्हारे पुत्र के हित में नहीं होगा।’’

‘‘अपने पुत्र का हित और अहित मैं अच्छी तरह समझती हूं।’’ सत्यवती का स्वर पर्याप्त आक्रामक था।



शान्तनु का मन हुआ कि उसे डांट दें: क्या समझती है वह अपने पुत्र का हित और अहित! उसके ममता के वृत्त में स्थान ही कितना है, विवेक के लिए। अपनी जड़ता को वह अपनी बुद्धिमत्ता समझती है...



पर सत्यवती के साथ बिताये गये उतने दिनों में ही वे अपने विषय में बहुत कुछ नया जान गये थे- स्वयं को कुछ अधिक ही पहचान गये थे।...



इन दिनों में उन्हें गंगा भी बहुत याद आयी थी। गंगा के छोड़ जाने के बाद से शान्तनु भीतर से बहुत ही दीन हो गये थे, ऊपर से चाहे वे कितने कठोर बने रहे हों... मन कुछ इतना उद्विग्न रहता था कि सत्यवती का रोष क्या, उसकी हल्की-सी उपेक्षा भी उन्हें विचलित कर देती थी। वे जानते थे, उसके रुष्ट होते ही, उनकी अपनी शान्ति नष्ट हो जाएगी; और वे तब तक सहज नहीं हो पाएंगे, जब तक कि सत्यवती को प्रसन्न ही न कर लें।... सत्यवती के विवेक पर उन्हें तनिक भी भरोसा नहीं था। वे जान गये थे कि उसकी आत्मा बहुत उदात्त भी नहीं है। अपने सीमित स्वार्थों में प्रसन्न है सत्यवती!... पर अब जैसी भी है, उनकी पत्नी है। उसे वे त्याग नहीं सकते थे। जाने क्यों उससे अलग होने की कल्पना के जागते ही उनके पैरों तले की भूमि निकल जाती थी।... और अब तो उसके गर्भ में उनकी अपनी सन्तान पल रही है... सन्तान-सम्बन्धी विवाद के कारण ही तो गंगा उनको छोड़ गयी थी। और अब फिर सन्तान के विषय में विवाद... तब प्रश्न सन्तान के जीवन का था, अब उसकी शिक्षा का है...



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‘‘देखो!’’ शान्तनु ने उसे समझाना चाहा ‘‘आश्रम में गुरु ही स्वामी होता है, पालक होता है, आश्रयदाता और अभिभावक होता है। इसलिए वहां उसका गुरुत्व जागता है। उसकी आत्मा उदात्त होती है। उसका विवेक और शिष्य के प्रति स्नेह, सब कुछ सचेत होता है। आश्रम में शिष्य, गुरु के सान्निध्य में रहकर, इन सारे भावों को ग्रहण करता है।...’’



‘‘शिष्य को ज्ञान ग्रहण करना है या गुरु के भाव को?’’ सत्यवती ने उनकी बात काट दी, ‘‘शास्त्रों से बुद्धि जागती है, ज्ञान-वर्धन होता है, तो ऐसा आश्रम में भी होगा और राजप्रासाद में भी। शास्त्रों के विषय में राजकुमारों को सूचना वन के आश्रम में भी दी जा सकती है और राजमन्दिर में भी। शस्त्रों का अभ्यास राजकुमार वन के वृक्षों की छाया में करें या राजा के उद्यान में- क्या अन्तर है।’’ सत्यवती ने बात बदली, ‘‘और मैं तो चाह ही रही हूं कि मेरा पुत्र गुरु से ज्ञान ग्रहण करते हुए भी यह न भूले कि स्वामी वही है। गुरु उसे शिक्षा देने वाला राज-कर्मचारी भर है। 



गुरु में उदात्त तत्त्व जागता है या नहीं- मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। मेरे लिए तो महत्त्वपूर्ण यह है कि मेरे पुत्र का शौर्य बढ़ता है। उसमें रजस-तत्त्व जागता है। वह जानता और मानता है कि वह राजा है, स्वामी है। उसका शस्त्र-ज्ञान बढ़ता है, वह अपने शत्रुओं का दमन करने में सफल होता है...’’ 




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