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Patrika news network Posted: 2017-03-09 15:14:29 IST Updated: 2017-03-09 15:14:29 IST
  • अगले दिन से सत्यवती का नाव चलाना दूभर हो गया। वह नाव में बैठती तो उसे लगता कि उसकी नाव तपस्वी के टापू की ओर भागती जा रही है।

जयपुर

बाबा हंस पड़े, ‘और तपस्वी सत्य को जान गए हैं कि हमें सुख नहीं मिल सकता, इसलिए उनके पास धन का सुख चाहे न हो, सन्तोष का सुख तो है...।

‘हां बाबा!’ बाबा गम्भीर हो गए, ‘तू जब नौका चलाती है तो तेरे शरीर को श्रम करना पड़ता है न।’ ‘हां बाबा!’ ‘तू उसे सुख मानती है या दुख?’ ‘वह तो मेरा सहज धर्म है बाबा! न सुख, न दुख!’ ‘उस समय तेरी नाव किसी नौका के आगे होती है, किसी के पीछे।’ ‘हां बाबा!’ ‘पर फिर भी आगे-पीछे किसी समय तू नदी पार कर ही जाएगी।’ ‘हां।’ ‘और यदि तू नाव चलाये ही नहीं। इसी किनारे बैठी रहे तो तू सुखी होगी या दुखी?’ ‘दुखी हूंगी बाबा!’ ‘क्यों बेटी?’ ‘क्योंकि एक तो मेरा शरीर अपना श्रम-धर्म नहीं निभायेगा तो आलसी होकर जुड़ता जाएगा और दूसरे मैं कभी नदी पार नहीं कर पाऊंगी।’



‘ठीक है बेटी!’ बाबा बोले, ‘राजा लोग वे हैं, जो नदी के पार पहुंच गए हैं। हम वे लोग हैं, जो आगे-पीछे अपनी नौकाएं चला रहे हैं। तपस्वी वे हैं, जो नदी के इस ओर, यह मानकर बैठ गए हैं कि हम नदी के पार पहुंच ही नहीं सकते।’



सत्यवती कई क्षणों तक चुपचाप बाबा को देखती रही, फिर जैसे साहस जुटाकर बोली, ‘एक बात पूछूं बाबा!’ ‘पूछ बेटी!’ ‘आप बुरा तो नहीं मानेंगे?’ ‘तू इतनी बुरी बात पूछने वाली है क्या?’



‘नहीं! पर आप कहीं यह न मान लें कि मैं अशिष्ट हो गई हूं। बड़ों के साथ विवाद करती हूं।’ ‘नहीं बेटी! तू पूछ। क्या पूछती है।’



‘बाबा! नौकाओं की दौड़ में चाहे कोई जीते या हारे, प्रत्येक नाविक हांफ जाता है। पर किनारे पर खड़ा दर्शक किसी की भी जीत-हार में नहीं है, इसलिए प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न है। सांसारिक जीव क्या नौका दौड़ का प्रतिस्पद्र्धी और तपस्वी किनारे पर खड़ा दर्शक नहीं है?’



‘साधारण गृहस्थ दौड़ का प्रतिस्पर्धी नहीं होता बेटी! वह तो चल रहा होता है। वह केवल अपना धर्म निभा रहा है, इसलिए दुखी नहीं है।’ बाबा ने कहा, ‘मैं अपना धर्म निभा रहा हूं, तू अपना निभा! निश्चित रू प से तू राजकन्या है सत्यवती। तू किसी राजा को ही प्राप्त करेगी। मैं पहुंचूं- न पहुंचूं- तू नदी के पार पहुंचेगी, तू राज-वधू होगी पुत्री! यदि किसी संन्यासी को ही सौंपना होता, तो मैं कब से तेरा कन्यादान कर चुका होता बेटी!’



‘मैं अपनी बात नहीं कह रही बाबा!’ सत्यवती ने कुछ अतिरिक्त प्रयत्न के साथ कहा।

‘तू अपनी बात नहीं कह रही, पर मैं तेरी बात कह रहा हूं।’ बाबा मुस्कराये, ‘तू राज-कन्या है। तेरा धर्म त्याग में नहीं, ग्रहण में है। मछली पानी में ही जीवित रहती है सत्यवती! हवा में आते ही उसके प्राण निकल जाते हैं- हवा कितनी भी सुखद क्यों न हो। तू त्यागमय जीवन में जीवित नहीं रह पाएगी।’ बाबा उठकर बाहर जाने को तैयार हुए, पर द्वार के बाहर जाते-जाते वे फिर लौट आये, ‘और तू इतना सोचा मत कर बेटी! अभी सोचने का वय नहीं है तेरा! सोचने का काम तू मुझ पर और अपनी अम्मा पर छोड़ दे।...’



बाबा चले गए और सत्यवती सोचती ही रह गई, क्या बाबा उसके विषय में सब कुछ जानते हैं? यदि जानते हैं तो इतने शान्त कैसे हैं? और नहीं जानते तो इतना सटीक कैसे बोल गए, जैसे सारी बात उसी के विवाह को लेकर चल रही हो...



बाबा कहते हैं कि वह राजकन्या है- वे उसका विवाह किसी राजकुमार से ही करेंगे... तब कैसा होगा जीवन सत्यवती का?... दास-दासियां, हाथी-घोड़े, रहने के लिए प्रासाद यात्रा के लिए रथ और साथ चलने के लिए अंग-रक्षक... सत्यवती की कल्पना में सब कुछ बहुत सजीव हो उठता है, पर जैसे ही अपनी कल्पना में वह राजकुमार की छवि आंकने का प्रयत्न करती है, तपस्वी पराशर की आकृति आकर उसकी कल्पना के सारे चित्रों को वैसे ही ढंक लेती है, जैसे इन्द्रधनुष आकर सारे आकाश पर आरोपित हो जाता है।



सत्यवती के कण्ठ से एक गहरा उसास फूटा, ‘कहीं मेरा तपस्वी ही कोई राजकुमार होता...’

अगले दिन से सत्यवती का नाव चलाना दूभर हो गया। वह नाव में बैठती तो उसे लगता कि उसकी नाव तपस्वी के टापू की ओर भागती जा रही है। हर समय उसके चप्पू अपनी नाव को उस टापू से दूर ठेलते रहते और सारे प्रयत्नों के बाद भी नौका उसी टापू की ओर बढ़ जाती। अन्तत: हार कर सत्यवती नाव को किनारे से लगाकर अपना सिर पकड़, रेत पर बैठ जाती... जाने नाव में ही कोई हठी प्रेत आ बैठा था, जो उसे किसी दूसरी दिशा में चलने ही नहीं देता था, या सत्यवती का अपना ही दिशा ज्ञान खो गया था... या कभी-कभी उसे लगने लगता था कि उसकी नाव में दो लम्बी रस्सियां बंधी हुई हैं। 



एक का सिरा टापू में बैठे तपस्वी के हाथ में है और दूसरी का सिरा हाथ में पकड़े, बाबा अपने स्थान पर खड़े हैं। जैसे ही सत्यवती नौका में बैठती है, दोनों अपनी-अपनी रस्सियां खींचने लगते हैं। उसी क्षण से सत्यवती का मन कांपने लगता है।... तपस्वी युवक है, बलवान है। बाबा बूढ़े हैं, निर्बल हैं... कहीं तपस्वी जीत ही न जाए। तपस्वी को पाकर सत्यवती प्रसन्न होगी, किन्तु अपने बाबा को पराजित देखकर उसका मन टूट जाएगा...




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