सबसे ज्यादा वैज्ञानिक है भारतीय संवत्सर, नए साल की तरह इसे क्यों नहीं मनाती युवा पीढ़ी?

Patrika news network Posted: 2017-03-26 12:30:23 IST Updated: 2017-03-26 12:44:30 IST
सबसे ज्यादा वैज्ञानिक है भारतीय संवत्सर, नए साल की तरह इसे क्यों नहीं मनाती युवा पीढ़ी?
  • यह संवत्सर हमें आनंद और परंपरा के प्रवाह का शीतल स्पर्श बांटने आता है। संवत्सर के आने के बाद अब यह जरूरी हो गया है कि हम इसकी उस प्राचीनता को समझें, जिसे हमारे ऋषि-मुनि सनातन विरासत के रूप में हमारे लिए छोड़कर गए हैं।

पंडित दिनेश शर्मा

जयपुर. भारतीय संवत्सर उस परंपरा का निर्वाह करता है, जिसमें बाहरीपन से दूर सांस्कृतिक समृद्धि का महाभाव छिपा है। यह संवत्सर हर बार नया मर्यादित यौवन धारण करके प्रकट होता है। 



यह हमें ऐसी आध्यात्मिक चेतना व ऊर्जा प्रदान करता है जो अर्थ और काम की ही नहीं वरन सदा धर्म और मोक्ष की राह दिखाती है। संवत्सर के प्रारंभ में ही कन्या पूजन परंपरा ने नारी सत्ता को शास्त्रीय आधार प्रदान किया है। 



समाज और राष्ट्र की आत्मा है संवत्सर

यह संवत्सर हमें आनंद और परंपरा के प्रवाह का शीतल स्पर्श बांटने आता है। संवत्सर के आने के बाद अब यह जरूरी हो गया है कि हम इसकी उस प्राचीनता को समझें, जिसे हमारे ऋषि-मुनि सनातन विरासत के रूप में हमारे लिए छोड़कर गए हैं। 



यह संवत्सर भारत की आत्मा है। आओ, अपनी अंजलि में अक्षत, पुष्प और पवित्र जल लेकर इस संवत्सर का अभिनंदन करें। इसे पाद्य, अर्घ्य, आचमन और मन मंदिर में बैठाने के लिए स्वर्ण का सुंदर आसन भेंट करें। यह 'साधारण' नाम का नया संवत्सर हमें सुख, शांति और समृद्धि का ऐसा आशीर्वाद देगा, जिसकी आज हमें सबसे ज्यादा जरूरत है। आओ करें पूरे जोश के साथ नव वर्ष का अभिनन्दन।



संवत्सर के शुरू (28 मार्च) से ही नौ दिनों की साधना शुरू हो जाती है। कन्या-मुख से नए अन्न को झूठा करवाने का श्रद्धा का सर्वोत्तम स्वरूप। घर-घर में 'रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।' की मंगल ध्वनि के साथ ही देवी से श्रद्धा, भक्ति और समर्पण की याचना और देवी की आराधना।



संवत्सर का काल क्रम और काल गणना

युगादि संवत, श्रीराम राज्य संवत, युधिष्ठिर संवत, विक्रम संवत और शक संवत से होती है। एक संवत्सर पूरा एक वर्ष माना जाता है। इसमें चैत्र, वैशाख व ज्येष्ठ इत्यादि भिन्न-भिन्न नाम के पूरे बारह महीने होते हैं। प्रत्येक मास दो पक्षों में बंटा होता है। प्रत्येक पक्ष में 15 तिथियां होती हैं। 



दो पक्ष कृष्ण और शुक्ल कहलाते हैं। साठ संवत्सर पूरे होते ही फिर से इनका क्रम प्रारंभ हो जाता है। इन संवत्सरों को तीन समान भागों में बांटा गया है। ये तीन भाग हैं ब्रह्म विंशति, विष्णु विंशति तथा रुद्र विंशति। प्रत्येक विंशति में 20 संवत्सर होते हैं। 



त्योहारों की सुदीर्घ परंपरा का काल

वा ल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम का अवतार काल वसंत ऋतु की पवित्रता से गुंथे चैत्र मास में है। अब यदि हमारी काल गणना गड़बड़ाने लगती तो श्रीराम का जन्मदिन कभी हमें भीषण गर्मी में मनाना होता और कभी सर्दी में। जबकि ऐसा सदियां बीत जाने पर भी आज तक नहीं हुआ। 



कह सकते हैं कि यदि हमारी काल गणना चरमराई होती तो हमारे सारे त्योहारों का मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाता। हमारे त्योहारों की सुदीर्घ परंपरा में काल निर्धारण का जो निश्चय है तो उसके भीतर छिपी है ऋषियों की अद्भुत गणितीय दृष्टि और धार्मिक दूरदर्शिता। 



कालखंड की गणना का माध्यम 

वैदिक साहित्य से लेकर अब तक समय को जानने-बूझने के लिए काल की गिनती करने के लिए वैज्ञानिक तौर पर एक अवधि निश्चित की गई। इस अवधि के हिसाब से समय की सबसे बड़ी इकाई 'कल्प' है। 



इसके बाद 'महायुग' और 'युग' हैं। इसी क्रम में एक इकाई 'संवत्सर' के रूप में मानी गई। संवत्सर के बाद अवरोही क्रम से अयन, ऋतु, मास, पक्ष, अहोरात्र, घंटा, मिनट और सेकंड हैं। इन सारी गणनाओं के होने पर भी किसी खास अवधि को जानने में संवत्सर अर्थात वर्ष का महत्त्व ही सर्वाधिक होता है। 



जीवन में नई ऊर्जा का संचार करता है नया काल 

वि क्रम संवत्सर का हमसे केवल बाहरी ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक जुड़ाव भी है। किसी भी धार्मिक मान्यता में संवत्सर या मास की गणना करने में कहीं सूर्य की तो कहीं चंद्रमा की गति को कारण माना जाता है। इसलिए वहां यह समस्या है कि लगभग हरेक महीने में कभी दिन कम पड़ जाते हैं तो कभी ज्यादा। इसके ठीक विपरीत भारतीय संवत्सर में सूर्य और चंद्रमा दोनों ही काल गणना में सहायक है। चंद्र तथा सौर मास, दोनों ही काल गणना में मुख्य हैं। अत: तिथियों का निर्धारण सूर्य और चंद्र दोनों की गति से होता है। 



पूर्णिमा चंद्रमा के परम विकास को प्रकट करती है तो अमावस्या उसके अभाव को। 12 राशियों में सूर्य प्रत्येक राशि में एक मास तक रहता है। अत: उसे एक चक्र पूरा करने में पूरे 12 महीने लगते हैं, जो एक संवत्सर हो जाता है। 



वैदिक गणित की यही अमर परंपरा सारे संसार में मानी जाती है। जैन, बौद्ध तथा सिख परंपरा में तिथि, मास और वर्ष इसी संवत्सर के आधार पर चलते हैं। त्योहार भी इसी संवत्सर के सहारे चलते हैं। 



इसका परिणाम यह हुआ कि हमारी प्रकृति और उसके अनुरूप सारे आहार-विहार इस संवत्सर के हिसाब से ही निर्धारित हैं। भले ही अंग्रेजी नववर्ष को 'हैप्पी न्यू ईयर' कहकर मनाएं लेकिन सही मायने में असली नववर्ष यही है। 




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