Video महासमरः पढ़िए महाभारत की अमर गाथा- 30

Patrika news network Posted: 2017-03-14 10:38:26 IST Updated: 2017-03-14 10:38:26 IST
  • शान्तनु ने एक लम्बे असुविधाजनक मौन के बाद कहा और सायास देवव्रत की ओर देखा। उन्हें लगा कि वे सहज रू प से देवव्रत की ओर देख नहीं पाएंगे; किन्तु मुंह मोडक़र भी वे शान्त नहीं रह पाएंगे

सत्यवती लौट आई। और आज तक वह एक क्षण के लिए भी भूल नहीं पाई कि उसका तपस्वी उसे इसलिए नहीं मिला क्योंकि वह राजकुमार नहीं था। उसका नन्हा कृष्ण द्वैपायन उससे छूट गया क्योंकि राजा कानीन पुत्र को स्वीकार नहीं करता, ऋषि ही स्वीकार कर सकता है। 



...राजवधू बनने के लिए बहुत बड़ा मूल्य चुकाया था सत्यवती ने ...और जब उसने मूल्य चुकाया ही है तो वह अपने अधिकार डंके की चोट लेगी ...बाबा ने यदि उसे राजरानी बनाना चाहा है तो अब वह राजरानी भी बनेगी और राजामाता भी ...तपस्वी ने तो कहा था कि उसके लिए सब ओर उपलब्धि ही उपलब्धि है। कहीं ऐसा न हो कि सत्यवती के लिए सब ओर वंचना ही वंचना हो...



‘मैंने सब कुछ सुन लिया है पुत्र!’

शान्तनु ने एक लम्बे असुविधाजनक मौन के बाद कहा और सायास देवव्रत की ओर देखा। उन्हें लगा कि वे सहज रू प से देवव्रत की ओर देख नहीं पाएंगे; किन्तु मुंह मोडक़र भी वे शान्त नहीं रह पाएंगे ...वस्तुत: अब देवव्रत से उनका वह सम्बन्ध नहीं रहा, जो आज तक था। उन्होंने अपने इस पुत्र को जाना ही नहीं था। उन्हें तो समय-समय पर कुछ सूचनाएं मिलती रही थीं- पहले पुत्र-जन्म की, फिर गंगा द्वारा उसे जल में प्रवाहित करने के प्रयत्न की। उन्होंने देवव्रत के प्राणों की रक्षा की थी; किन्तु उसके लिए देवव्रत को पहचानने की कोई आवश्यकता नहीं थी- गंगा की गोद में जो भी शिशु होता, उसे वे अपना पुत्र मानकर, उसके लिए चिन्तित हो जाया करते थे। वह तो उनका अपना मोह था। 



उस शिशु, जिसका नाम देवव्रत था, को तो वे आज तक नहीं जान पाए ...गंगा चली गई थी और वे विक्षिप्त हो उठे थे। उन्हें किसी बात का ध्यान नहीं था, किसी चीज का होश नहीं था। गंगा के वियोग से जन्मी उग्रता और हिंसा को दबाए रखने के लिए उन्होंने आखेट का सहारा लिया था; और वर्षों तक वनों में भटकते रहे थे। उन्होंने समझा था कि महादेव शिव के समान उन्होंने भी अपनी उग्रता में ‘कामदेव’ को भस्म कर दिया है ...पर देवव्रत के निकट वे तब भी नहीं आ पाए थे। 



वे इतना ही जानते थे कि उनका एक पुत्र है- देवव्रत जो आज इस ऋषि के आश्रम में है, तो कल उस ऋषि के आश्रम में। वे उसकी प्रशंसा सुनते रहे : युद्ध में बहुत कुशल है, शास्त्रों में पारंगत है, चरित्रवान है ...पर देवव्रत को वे जान तब भी नहीं पाए ...सहसा उन्होंने यमुना-तट पर सत्यवती को देखा और तब उन्होंने अपने-आपको जाना। 



...वे शिव नहीं थे। उनके मन में ‘काम’ का दहन नहीं हुआ था- उन्होंने उसे अपनी उग्रता में दबा मात्र रखा था। सत्यवती के रू प में उस उग्रता को शान्त कर दिया था, हिंसा को उसका वास्तविक स्वरू प समझा दिया था। वह तो वस्तुत: उनकी कामेच्छा ही थी, जो सृष्टि न कर पाने की अपनी  अतृप्ति में ध्वंसात्मक रू प ग्रहण कर चुकी थी। सत्यवती के सौन्दर्य ने उसे अपने वास्तविक रू प में परिणत कर दिया था- कामेच्छा में।



और तब शान्तनु को लगा था कि गांगेय जैसा उनका पुत्र है ही क्यों? उनका कोई भी पुत्र न हुआ होता तो वे सुविधा से, बिना किसी अपराध-बोध के सत्यवती से विवाह कर लेते। विवाह को, उनकी आवश्यकता और अधिकार ही नहीं, उनका धर्म भी माना जाता। ...उन्हें लगा कि गंगा को जाना ही था ...वह जानती थी कि उसे जाना ही है, शायद इसीलिए वह उनके पुत्रों को जीवन-मुक्त करती जा रही थी, ताकि उन्हें दूसरे विवाह में असुविधा न रहे। पर वे ही व्यर्थ के मोह में पड़ गए थे।



तब उन्होंने अपने हृदय को पहचाना था। गांगेय के लिए उनके मन में कोई मोह नहीं था। वह तो उनके मार्ग की बाधा था। सत्यवती सामने थी ...उनका विवाह हो सकता था; पर गांगेय जैसे पुत्र ...पुत्र केवल सुख के लिए ही नहीं होता। पुत्र जीवन में बाधा भी होता है ...गंगा इसे भी जल में प्रवाहित कर देती तो क्या क्षति हो जाती ...आज वह उनके विवाह के मार्ग की बाधा है। वह उनसे उनके जीवन के परम सुख को छीन रहा है ...वह उनका शत्रु है। जीवन में उन्हें इतना वंचित तो उनके शत्रुओं ने भी कभी नहीं किया...



उन्होंने काम के वेग को पहचाना था। काम जब मन से निकल, रक्त के माध्यम से शरीर की सारी शिराओं में समा जाता है तो उसे झेल पाना सम्भव नहीं है ...कम-से-कम शान्तनु के लिए तो सम्भव नहीं ही है। शान्तनु के मन में अवसाद ही नहीं घिरता, आक्रोश भी जागता है। उनके वश में होता तो वे पृथ्वी को फोड़ देते, दृष्टि को ध्वस्त कर देते। ...पर यह सब उनके वश में नहीं था। 



अब तो यह भी उनके वश में नहीं था कि धनुष-बाण उठाकर आखेट के लिए वन में चल देते ...अब तो इस दुर्निवार आघात को सहना ही था ...नरक में कैसी यातना दी जाती है, वे नहीं जानते थे, पर वे जानते थे कि वह यातना भी इस भयंकर काम-यातना से अधिक कष्टकर नहीं होगी ...उन्हें लगा था कि उनके अपने पुत्र इस गांगेय ने उन्हें बलात् पकडक़र अग्नि के झरने के नीचे खड़ा कर दिया है और कह रहा है ‘जल!’




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