Ad Block is Banned Click here to refresh the page

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे

दुनिया के किसी भी कैलेंडर में नहीं हिंदू पंचांग जैसी ये खूबियां, जानकर करेंगे हमारे प्राचीन ऋषियों को नमन

Patrika news network Posted: 2017-03-28 12:13:18 IST Updated: 2017-03-28 12:18:51 IST
दुनिया के किसी भी कैलेंडर में नहीं हिंदू पंचांग जैसी ये खूबियां, जानकर करेंगे हमारे प्राचीन ऋषियों को नमन
  • राजा शाक्य को पराजित करके विक्रमादित्य ने काल गणना वाली विक्रम संवत को प्रचारित व स्थापित किया, जिसकी संस्तुति तत्कालीन ज्योतिष ऋषि वराहमिहिर की ओर से भी की गई।

जयपुर

हमारी संस्कृति में सर्वमान्य नववर्ष प्रारंभ चैत्र नवरात्र प्रथमा तिथि से ही होता है। माना जाता है इसी दिन ब्रहमा जी ने सृष्टि की रचना की। यह नवसंवत्सर अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 28 मार्च को प्रात: 08 बजकर 28 मिनट से मेष लग्न में प्रवेश करेगा। 



इसे मनाने की लंबी परंपरा रही है। ऋषि-मुनि और उसके बाद हम इसे मनाते आ रहे हैं। समय के  साथ मॉडर्न होता युवा जितनी उमंग के साथ पश्चिमी दिवसों को मनाता है, उतनी ही शिद्दत के साथ अपनी परंपराओं का पालन भी करने लगा है। आज का युवा अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहता है। भले ही उसका तरीका अलग हो, किंतु अपनी मान्यताओं और सांस्कृति से जुड़ाव रखकर वह गर्व महसूस करता है।



 इस मुस्लिम देश में सदियों से जल रही है मां दुर्गा की अखंड ज्योति



ग्रैगेरियन कैलेंडर के मुकाबले ज्यादा सक्षम

सम्राट विक्रमादित्य का राज्यकाल भारत का स्वर्णिम काल माना जाता है। उस समय शक सम्वत की परंपरा थी। राजा शाक्य को पराजित करके विक्रमादित्य ने काल गणना वाली विक्रम संवत को प्रचारित व स्थापित किया, जिसकी संस्तुति तत्कालीन ज्योतिष ऋषि वराहमिहिर की ओर से भी की गई। 



हमारे सभी अनुष्ठानों, संकल्पों में जब काल व स्थान को बोला जाता है, तब विक्रम संवत का वर्ष मास पक्ष तिथि ही बोली जाती है, जो धार्मिक आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी सर्वमान्य है। वैसे तो समस्त गणनाएं ग्रहों राशियों व नक्षत्रों के आधार पर होती हैं, किंतु पृथ्वी के सबसे अधिक निकट चंद्रमा की गणना इस पृथ्वी के लिए सबसे सटीक व महत्वपूर्ण है। 



विक्रम तिथि चौबीस घंटे में कभी भी प्रारंभ हो सकती है, क्योंकि एक तिथि की न्यूनतम आयु 19 घंटे व अधिकतम आयु 26 घंटे होती है। 



इस प्रकार तिथि की अवधि तथा साथ ही एक मास की अवधि पूरे तीस दिन न होकर 29. 5 दिन के लगभग होती है। यानी विक्रम संवत की गणना चंद्रमा आदि की सूक्ष्म गति पर आधारित है। अंग्रेजी तारीख हमेशा रात 12 बजे इसलिए बदलती है, क्योंकि उसमें कोई सूक्ष्म गणना होती ही नहीं। 



इस नवरात्र में नवग्रह देंगे और अच्छे प्रभाव

नवरात्र में बनने वाला योग बड़ी मात्रा में सौम्य ऊर्जा व शक्ति तो प्रदान करता ही है साथ ही नौ दुर्गा तथा दस महाविद्याओं की शक्तिशाली कृपा भी प्राप्त कराने में सफल होता है, क्योंकि नवरात्रों में ग्रहों का राजा सूर्य, जिसके चारों ओर सभी ग्रह चक्कर काटते हैं अपनी मूल दिशा ठीक पूर्व से ही उदित होते हैं। 



ऐसे में नवरात्र, नवग्रह शांति के लिए अति विशेष हो जाती है, क्योंकि जब ग्रह-राज सूर्य, अपनी मूल स्थिति में हो तो उनके अधीनस्थ ग्रहों का भी अनुकूल प्रभावी होना मुश्किल नहीं रह जाता। अत: नवग्रहों को अनुकूल करने के लिए  यंत्र के समक्ष नवग्रहों का जापविशेष प्रभावी हो जाता है।



सतयुग तक जलती रहेगी मां ज्वाला की यह ज्योति, जिसने झुकाया शीश, पूरी हुई मुराद



काल परिवर्तन के होते हैं ये नौ दिन

ये नौ दिन, काल व ऋतु परिवर्तन के होते है। प्रकृति में इन दिनों भारी वायुमण्डलीय परिवर्तन क्रमिक रूप से होते हैं और उनसे हमारा मन, मस्तिष्क और शरीर स्वस्थ रहे, इसके लिए सभी लोग सात्विक आहार-विहार अपनाते हैं और धार्मिक नियमों की पालना करते हैं। 



शरीर की बाहरी शुद्धि के लिए शुद्धता, पवित्रता से रहना, पवित्र वातावरण में पवित्र वस्तुओं से ही संपर्क रखा जाता है और आंतरिक शुद्धता के लिए दैवी शक्तियों के साथ साथ अपने ईष्ट की उपासना व साधना परम शक्तिशाली हो जाती है। 



विक्रम संवत की कालगणना

हमारी गौरवशाली परंपरा विशुद्ध अर्थो में प्रकृति के खगोलशास्त्रीय सिद्धातों पर आधारित है और भारतीय कालगणना का आधार पूर्णतया पंथ निरपेक्ष है। प्रतिपदा का यह शुभ दिन देश की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। 



ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्रमास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि संरचना प्रारंभ की। यह भारतीयों की मान्यता है, इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्षारंभ मानते हैं। यह दिन ही वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय दिलाने वाला है। 



इसी दिन महाराज युधिष्टिर का भी राज्याभिषेक हुआ और महाराजा विक्रमादित्य ने भी शकों पर विजय के उत्सव के रूप में मनाया। 



नवरात्र शब्द से विशेष रात्रियों का बोध होता है। रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक है। रात्रि का विशेष रहस्य न होता तो उत्सवों को रात्रि न कहकर दिन कहा जाता।  



वैज्ञानिक तर्क है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध समाप्त हो जाते हैं। दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढऩे से रोक देती हैं। रेडियो इस बात का जीता-जागता उदाहरण है



हिंदू नववर्ष का महत्व

आज के दौर में अंग्रेजी कैलेंडर का प्रचलन बहुत अधिक हो गया हो, लेकिन उससे भारतीय कैलेंडर की महत्ता कम नहीं हुई है। आज भी हिंदू परंपरा के अनुसार अपने व्रत-त्योहार, यज्ञ, महापुरुषों की जयंती-पुण्यतिथि, विवाह व अन्य शुभ कार्यों को करने के लिए मुहूर्त आदि भारतीय कैलेंडर के अनुसार ही देखते हैं। 



खौलते दूध से नहाता है मां दुर्गा का यह भक्त, नहीं जलती त्वचा, लोग मानते हैं चमत्कार



ऐसे करें कलश की स्थापना

घर की पूर्व दिशा में स्थित कमरे को शुद्ध करके, एक स्थान पर शुद्ध मिट्टी रखें और उसमें जौ बो दें। शुभ मुहूर्त में कलश में जल भरकर मिट्टी पर स्थापित करें। कलश के ऊपर रोली से 'ऊँ' व 'स्वास्तिक' शुभ चिह्न बनाने से पूर्व कलश के मुख पर शुभ कलावा अवश्य बांधें तथा जल में सतोगुणी तीन हल्दी की गांठें, 12 रेशे केसर के साथ अन्य जड़ी, बूटियां व पंच रत्न चांदी अथवा तांबे इत्यादि के सिक्के के  साथ गंगा जल, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, रोली, चंदन, अक्षत, पुष्प आदि डालें और कलश को पूर्ण रूप से भर दें। मुख पर आम, पीपल, बरगद, गुल्लर व पाकर के पत्ते इस प्रकार रखें कि डंडी पानी में भीगी रहे। कलश के मुख पर चावल भरा कटोरा और लाल कपड़े में लिपटा कच्चा नारियल रखें। पूर्व-दक्षिण दिशा के मध्य आग्नेय कोण में चावलों की ढेरी के ऊपर दीप स्थापित करें। 



शास्त्रानुसार मनाएं नवसंवत्सर

नव वर्ष का आवाहन मंत्र

ऊं भूर्भुव: स्व: संवत्सर अधिपति आवाहयामि पूजयामि च 



आवाहन पश्चात

यश्चेव  शुक्ल प्रतिपदा धीमान श्रुणोति  वर्षीय फल पवित्रम भवेद धनाढ्यो बहुसश्य भोगो जाह्यश पीडां  तनुजाम , च वार्षिकीम



अर्थात जो व्यक्ति चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को इस पवित्र वर्ष फल को श्रृद्धा से सुनता है तो धन धान्य से युक्त होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ब्राह्मण या ज्योतिषी को बुलाकर नव संवत्सर का फल  सुनने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है ।



rajasthanpatrika.com

Bollywood