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Video : विभाजन के कोपभाजन ने बदली हाथ की लकीरें, देश को दिया संबल

Patrika news network Posted: 2017-06-20 13:50:50 IST Updated: 2017-06-20 13:50:50 IST
  • शरणार्थी से पुरुषार्थी बनने की इस यात्रा में आर्थिक ही नहीं सामाजिक, सास्कृतिक और राजनीतिक भिन्नता की पीड़ा भी झेलनी पड़ी। कई दशकों तक चले इस संघर्ष की गाथा में भागीदार बने लोगों के जेहन में अब उन पलों की यादें रह गई हैं जिन्हें नई पीढ़ी सुनना भी नहीं चाहती।

धर्मेंद्र अदलक्खा. अलवर.

1947 का समय देश के वो लाखों लोग नहीं भूल सकते,  जिन्हें पुर्वजों से पाई विरासत को रातों-रात छोड़कर आना पड़ा। वो मंजर कैसे भूल सकते हैं। अब उन्हें नया घर, रोजगार के साथ बच्चों के पेट भरने की चिंता थी।  


जीवन में संघर्ष का एक नया सफर देश आजादी की खुशी और विभाजन से प्रारम्भ हुआ जो कई दशकों तक चला। अपने ही देश में रहकर शरणार्थी कहलाने की  पीड़ा और अभावों को झेलने के बाद शरणार्थी  से पुरुषार्थ की यह लंबी यात्रा से नई पीढ़ी अनभिज्ञ है।


शरणार्थी से पुरुषार्थी बनने की इस यात्रा में आर्थिक ही नहीं सामाजिक, सास्कृतिक और राजनीतिक भिन्नता की पीड़ा  भी झेलनी पड़ी। कई दशकों तक चले इस संघर्ष की गाथा में भागीदार बने लोगों के जेहन में अब उन पलों की यादें रह गई हैं जिन्हें नई पीढ़ी सुनना भी नहीं चाहती।


पत्रिका ने विश्व शरणार्थी दिवस पर ऐसे ही कुछ बुजुर्गों से उनके संघर्षों  के दिनों के बारे में जाना तो उनकी आंखें छलक उठी। इस  संघर्ष में बहुत  से अपने को खोने का गम भी था तो उनकी आंखों में तरक्की की खुशी भी दिखी। देश विभाजन के साथ  अलवर जिले में हजारों की संख्या में विस्थापित परिवार आए। अलवर शहर ही नहीं जिले के खैरथल सहित कई कस्बे व गांवों में बसें हैं ऐसे पुरुषार्थी।

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आज भी याद हैं अपने घर


अलवर जिले में विस्थापित होकर आए बहुत से ऐसे बुजुर्ग हैं जिन्हें विस्थापित से पहले वाले अपने घर और दुकान आज भी याद हैं। वर्तमान पाकिस्तान में उनके बचपन के मित्र भी हैं जिनके पत्र भी अब तक आते हैं।


गोविन्दगढ़ के समीपवर्ती ग्राम मस्तपुर निवासी रमेश चंद खत्री का कहना है कि उनके पिता दीवान चंद खत्री के पास उनके वर्तमान में स्थित पाकिस्तान दोस्त को विभाजन के 30 वर्ष बाद पत्र आया था। जिसमें उस दोस्त ने अपना मकान आकर देखने को कहा था।


उसके बाद वहां से कई पत्र आए जिनमें उन्होंने हमारा घर संभाल कर रखने की बात कही थी। पत्र में उनका छोडग़ए सोना भी ले जाने को कहा था लेकिन पिताजी वहां इसलिए नहीं गए कि यदि वे वहां जाएंगे तो पुरानी यादें देखकर जीवित नहीं रह पाएंगे।


अलवर में लगे शिविर


यहां के राज परिवार और राष्ट्रीय  स्वयं  सेवक संघ की ओर से विस्थापित होकर आए परिवारों की सहायता के लिए जगह-जगह  शिविर लगाए गए। इन शिविरों में इन परिवारों के भोजन की व्यवस्था की गई। अलवर जिला मुख्यालय पर यशवंत स्कूल, नयाबास स्कूल सहित कई स्थानों पर कैम्प लगे। शिविरों में रहते हुए लोग धीरे-धीरे मजदूरी को निकल पड़ते थे।


विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों की पढ़ाई के लिए रात्रिकालीन कक्षाएं चली। परिवार का पालन-पोषण करने के लिए जिसको भी जैसे काम मिला, वह मजदूरी करने लगे। कई माह की प्रक्रिया के बाद विस्थापित परिवारों को खेती व घर के लिए जमीन आवंटित हुई। बहुत से विस्थापित परिवार तो इस जमीन से वंचित भी रह गए। किसी को सुदूर गांव या पहाड़ की तलहटी में मिली जमीन। अपनी मेहनत और लगन से खेतों में फसलें लहलहाने लगी। बदहाली से खुशहाली मेें बदलने की यह कहानी  कुछ लोगों के जेहन में अब भी है।

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अपनों को खोने का गम


अलवर जिले में दिल्ली से ट्रेन में हजारों की संख्या में विस्थापित परिवार आए। अलवर आए परिवार पहले दिल्ली सहित हरियाणा व कई स्थानों पर शिविरों में रहे जिन्हें अलवर जिले में भेज दिया गया। इस दौरान बहुत से परिवारों के सदस्य आपस में बिछड़ गए जो वर्षों बाद मिले। 


संचार  के साधनों में कमी होने के कारण विस्थापित परिवारों को अपने परिजन और रिश्तेदार ढूंढने में ही वर्षों लग गए। अलवर जिले में जिला मुख्यालय, खैरथल, किशनगढ़बास, रामगढ़, गोविन्दगढ़, राजगढ़ क्षेत्र में विस्थापित परिवारों को बसाया गया। पुरुषार्थी धर्मशाला समिति के अध्यक्ष अशोक आहूजा का कहना है कि पुरुषार्थियों के संघर्ष की लंबी गाथा है जिसे नई पीढ़ी को बताना चाहिए। अलवर इस संघर्ष का गवाह रहा है।


इन्होंने देखा देश विभाजन और दिल दहलाने वाले दृश्य


 पड़ौसियों ने बचाई जान


समाजसेवी दौलत राम हजरती को देश विभाजन के समय के सभी दृश्य याद हैं। डेरा इस्माइल खां में जन्मे दौलत राम हजरती की देश विभाजन के समय 7 वर्ष की उम्र थी। उन्होंने बताया कि  विभाजन के समय उनकी बस्ती पर काबालियों ने हमला कर दिया तो पड़ौसियों ने उनकी जान बचाई। वहां हमे कोतवाली में रखा गया। इनके परिवार को दिल्ली  से अलवर भेजा गया और लाहौर में जमीन अलॉट की गई। अलवर के एक स्कूल में सभी विस्थापितों को ठहराया गया। यहां शुरु के सालों में  लोगों को बहुत कष्ट झेलने पड़े।


अलवर के सक्का पाड़ी में रहकर उन्होंने बिस्कुट तक बेचे ओर अपनी पढ़ाई भी की। यहां पढ़ाई करते हुए उन्होंने आईटीआई की ओर वे सरकारी नौकरी में उच्च  पद तक पहुंचे। इनके भाई हरीश चंद अमेरिका में डायमंड ज्वैलरी निर्माता हैं। इनका कहना है कि मैंने ट्रेन में कत्लेआम भी देखा है, वो दृश्य याद कर दिल कांप जाता है।


 हरिद्वार आए तो वापस घर ही नहीं जा सके


डेरा इस्माइल खां में 1933 में जन्मे रामलाल आहूजा का कहना है कि  उनका परिवार देश आजादी से कुछ माह पहले मई 1947 में स्नान करने के  लिए हरिद्वार आया था लेकिन इसके बाद इतने दंगे हुए कि उनका परिवार वापस अपने घर ही नहीं जा सका। उनके पिता वहां किराने की दुकान चलाते थे। यहां बिना रोजगार के पेट भरना भी मुश्किल हो गया था। उन्हें अलवर में यशवंत स्कूल में ठहराया गया तो यहां उनके पिता ने मजदूरी करके उन्हें पाला। 

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विभाजन के समय उनकी उम्र 14 वर्ष थी ओर वे कक्षा आठवीं पास कर चुके थे। यहां उन्हें यशवंत स्कूल में कक्षा नवीं में प्रवेश मिला और इसके बाद उन्होंने एमए तक पढ़ाई की और सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापक बने। वे प्रोफेसर पद से रिटायर्ड हुए।  उनका कहना है कि जीवन में संघर्ष  से मुंह नहीं मोडऩा चाहिए। संघर्ष से जीवन में सफलता आवश्यक रूप से मिलती है।


 बर्फ का थर्मस टूटा तो ठेकेदार ने खूब पीटा


जिला रोजगार अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुए सरदार सज्जन सिंह जावा का कहना है कि देश विभाजन के समय उनकी उम्र 8 वर्ष थी। शुरु में उन्हें यशवंत स्कूल में लगे शिविर में ठहराया गया। वे  नयाबास शिविर में रहते हुए दिन में आइस्क्रीम बेचते थे। एक  दिन आइस्क्रीम का थर्मस टूट गया तो ठेकेदार ने खूब पीटा और उसे पुलिस के हवाले कर दिया। यदि वे बर्फ नहीं बेचते तो घर में खाना कैसे बनता। वे दूसरे दिन ठेकेदार से माफी मांगकर फिर आइस्क्रीम बेचने लगे। 


उन्होंने अलवर शहर में मंूंगफली व चने बेचते हुए पढ़ाई की और रोजगार विभाग में नौकरी लगी। कई दशक तक लंबे संघर्ष के बाद उन्हें मुकाम मिला। देश विभाजन के समय की यादों को वो संजोते हुए उनकी आंखें भीग गई।  उनका कहना है कि पुरुषार्थी नाम हमने आपको नहीं दिया बल्कि यहां के लोगों ने हमारी मेहनत और मुकाम को देखकर दिया है।


सोना-चांदी नम्बरदार को  सौंप कर आ गए


शिक्षाविद् राजाराम सोनी का कहना है कि देश विभाजन के समय उनकी उम्र 11 वर्ष थी। हामरा गांव कोट सावनमल जिला झंग था। उन्होंने बताया कि वे उस समय कक्षा चौथी में पढ़ता था। हमारे यहां दंगे अधिक होने के कारण एक धर्मशाला में रुकवाया गया लेकिन हमारी धर्मशाला को कुछ लोगों ने घेर लिया।


कई लोग धर्मशाला से बाहर आए तो उनकी हत्या कर दी। हमारे गांव के नम्बरदार ने हमारी जान बचाई और हमने सारा सोना उसे अमानत के लिए दे दिया। हमें हरियाणा में शिविर में रखने के बाद अलवर लाया गया। हमें गोविन्दगढ़ के समीपवर्ती गांव मस्तपुर में जमीन मिली और वे आगे पढऩे लगे और शिक्षा अधिकारी तक बने।


आज भी जेहन में है देश  आजादी से पहले की बातें


3 अक्टूबर 1940 में जन्मी सावित्री थदानी को आज भी देश आजादी से पहले की सभी बाते  याद हैं। उन्होंने बताया कि सिन्ध प्रांत में  गांव सक्सर में वे रहते थे।  उनके पिता का किराने का काम था। उनका एक घर दिल्ली में भी था।


देश आजादी से कुछ दिन पहले ही वे  परिवार के साथ दिल्ली आ गई। बाद में इतना गदर हुआ कि वे अपने पुराने घर ही नहीं जा सकी।  इस समय  पूरे देश में अराजकता का माहौल पैदा हो गया।  देश विभाजन के बाद विस्थापित होकर आए लोगों को भारी परेशानी हुई जिसके कारण  कई वर्षों तक लम्बा संघर्ष  चला।


संघर्ष किया तो मिला मुकाम


2 फरवरी 1934 को झंग जिले में जन्मे चरणजीत सुनेजा का कहना है कि उनके पिता बावलपुर में आढ़त का काम करते थे लेकिन विभाजन के बाद पूरे परिवार को संघर्ष का सामना करना पड़ा।  यहां आकर कितने परिवार ऐसे उजड़े कि  जिन्हें फिर बसने में वर्षों लग गए। उनके परिवार को कई शिविरों में रखा गया जिसके बाद उन्हें पीलवा बहादरपुर में जमीन अलाट हुई। देश विभाजन के समय कई रिश्तेदार हमसे  बिछड़ गए जिन्हें ढूंढने में वर्षों लग गए।


नंगे पैर  परीक्षा देने आए


देश विभाजन से पूर्व 1940 में जन्मे गोकुल नाथ गुलाटी ने बताया कि महाराज तेज सिंह ने उनके चाचाजी को गोला का बास में जमीन आवंटित की। यहां 6 माह मेहनत करने के बाद उन्हें थोड़ी सी मक्का मिल पाई। उनके पिताजी को बहादुरपुर में  जमीन आवंटित हुई। जब वे अलवर आठवीं की परीक्षा देने आए तो उनके पैर में चप्पल भी नहीं थी। यहां पढ़ते हुए तीन दोस्त साइकिल किराए पर लेकर बहादुरपुर जाते तो बहुत खुशाी होती।   यहां पढ़ाई करने के बाद वे आधुनिक ढंग से खेती करने लगे।


जिस ट्रेन में आए, उस पर ही  कर दिया हमला


1 मई, 1943 को बन्नू जिले के गांव केचीकमर में जन्मे रोशन लाल तलवार बताते हैं कि  विभाजन के समय लोग पैदल ही वहां से निकल कर आ गए। बहुत से लोग लोकल ट्रेन से आए। जिस ट्रेन पर वे आ रहे थे, उस ट्रेन पर हमला कर दिया जिसमें कई जानें गई।  ट्रेन में बच्चों को सीटों की नीचे छिपाना पड़ा। वहां सम्पन्न  रहे परिवारों को विस्थापन के बाद भारी कष्टों का सामना करना पड़ा।  यहां आकर उन्होंने पढ़ाई कि और वे भूगोल राजकीय  कॉलेज व्याख्याता के  पद से सेवानिवृत्त हुए।


बचपन में देखे कैम्प और भुखमरी


डेरा इस्माइल खां में जन्मे  भगवान दास अरोड़ा का कहना है कि  वहां उनके परिवार को खेती  और कपड़े  का थोक व्यापार था लेकिन उन्हें यहां आकर शरणार्थी बनना पड़ा। जो बचपन के दिन खेलने कूदने के दिन थे, उन दिनों में उनके परिवार को कैम्प पर रहना पड़ा और सड़कों पर जीना पड़ा। अलवर के लोगों ने खूब सहारा दिया और उन्हें सम्मान दिया। सभी के सहयोग और प्रेम के कारण कठिन दिन भी आसान हो गए।


कई दिनों तक खाना नहीं खाया


शांति कुंज निवासी कंवर सिंह का कहना है कि पाकिस्तान विभाजन के समय उनकी उम्र 7 वर्ष थी। विभाजन की पीड़ा को वे अभी तक नहीं भूले हैं। यहां आकर उन्होंने कितने काम किए जो उन्हें भी याद नहीं है। इस समय मात्र अपने परिवार का पेट भरना ही सबसे बड़ा काम था। यहां के लोगों ने उनका खूब सहयोग किया और अपनत्व  दिया। नई पीढ़ी को उनका संघर्ष याद ही नहीं है।


तन पर जो कपड़े थे, वहीं लेकर आए


1940 में टांक तहसील  में जन्मे हरदयाल अरोड़ा का कहना है कि  विभाजन के समय उनके यहां इतने दंगे हुए कि उनके घरों को ग्रेनेड के गोलों से तहस-नहस कर दिया।  इस समय ट्रकों में भरकर आर्मी के साथ  डेरा इस्माइल खां भेजा गया और वहां से हम दिल्ली आए।   यहां आकर उनके पिता व परिवार के हर सदस्य ने मजदूरी की और अपना पेट भरा।

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