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हजारों साल पुराने हैं यहां के कल्पवृक्ष, श्रद्धालु कभी नहीं लौटते खाली हाथ

Patrika news network Posted: 2017-07-16 22:13:46 IST Updated: 2017-07-16 22:13:46 IST
हजारों साल पुराने हैं यहां के कल्पवृक्ष, श्रद्धालु कभी नहीं लौटते खाली हाथ
  • मांगलिवास में प्रसिद्ध है नर-नारी कल्पवृक्ष। प्रजापिता ब्रह्माजी की सलाह पर देवताओं के समुद्र मंथन करने पर निकला था कल्पवृक्ष।

योगेश आचार्य/मांगलियावास।

 प्राचीन दर्शनीय स्थल कल्पवृक्ष का धार्मिक मेला 23 जुलाई को भरेगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार कल्पवृक्ष मेले के साथ ही प्रदेश में मेले भरने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। मांगलियावास के कल्पवृक्ष विश्वविख्यात हैं। यहां श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होती हैं। लोग यहां से खाली नहीं लौटते हैं। कस्बे में कल्पवृक्ष मेले की तैयारियां शुरू हो गई हैं। मेला ग्राउंड पर झूला-चकरी के अलावा खाद्य पदार्थों, खिलौने और अन्य स्टॉल लगाई जाएंगी।

12 साल में एक बार लगता फल

कल्पवृक्ष पर 12 वर्ष में एक बार फल लगता है। यह किसी भाग्यशाली को ही मिलता है। प्रतिवर्ष हरियाली अमावस्या को यहां मेला भरता है। इस दिन महिलाएं, कन्याएं व्रत रखकर इनकी पूजा-अर्चना कर मनौतियां मांगती हैं। यहां प्रति सोमवार और अमावस्या को भी भीड़ लगी रहती है।

300 साल से लग रहा मेला

पुजारी राधिकादास ने बताया कि यहां करीब 300 वर्ष से लगातार धार्मिक मेला लगता है। कल्पवृक्ष की ऊंचाई 23 से 25 मीटर और तने की मोटाई 10 मीटर है। दो वृक्षों के पास होने से फूलों के परागित होने के उत्तम परिणाम मिलते हैं। उनकी शाखाओं और तनों के खोखले हिस्से में जमा पानी जीव-जंतुओं, टहनियां मधुमक्खियों के छत्तों तथा हरी पत्तियां और जड़ें खाने और फल का गूदा श्वास, ज्वर, दांत, गुर्दा रोग में लाभदायक है

समुद्र मंथन से निकला कल्पवृक्ष

भारतीय संस्कृति के पौराणिक धार्मिक ग्रंथों के अनुसार एक बार देवता असुरों से हारकर बहुत दुखी हुए। उन्हें असुरों से जीतने का कोई उपाय नहीं दिखा तो वे प्रजापिता ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी सुमेरू पर्वत पर सभा कर रहे थे। उन्होंने देवताओं को दैत्यों से संधि कर समुद्र मंथन की सलाह दी। उनकी सलाह पर देवताओं ने समुद्र मंथन किया तो उसमें से निकलने वाले रत्नों में से एक कल्पवृक्ष था। कल्पवृक्ष मनोकामना पूर्ण करने वाला देवशक्ति से ओत-प्रोत माना जाता है।

यह है पौराणिक कथा

मान्यतानुसार साधु मंगलसिंह ने शिष्य फतेहसिंह के साथ यहां डेरा डाला था। एक यति को आकाश मार्ग से कल्पवृक्ष ले जाते देख उसने अपनी शक्तिसे भूमि पर उतरवा दिया था। कलांतार में वह अपने परोपकारी गुणों तथा मनोकामना पूर्ण करने के कारण पूजनीय बन गए। मांगलियावास का नामकरण भी इन्हीं मंगलसिंह अथवा मांगलियावास मनोकामना करने वाला के आधार पर हुआ बताते हैं। यहां धार्मिक मेले में सांस्कृतिक, खेलकूद प्रतियोगिताएं होती हैं। मेले में ब्यावर, अजमेर, बिजयनगर, किशनगढ़, पीसांगन, पुष्कर, सरवाड़, केकड़ी, मसूदा और राज्य के दूरदराज इलाके से हजारों श्रद्धालु शामिल हेाते हैं।

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